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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी: 5 फरवरी को गणेश व्रत

नेशनल डेस्क, मुस्कान कुमारी।

नई दिल्ली। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी पर पड़ने वाली द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 फरवरी 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने से सुख-समृद्धि, संतान प्राप्ति और विघ्नों का नाश होने की मान्यता है।

द्रिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी 5 फरवरी की रात 12:09 बजे से शुरू होकर 6 फरवरी की रात 12:22 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर व्रत और पूजा 5 फरवरी को ही की जाएगी।

शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय समय

  • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 5:22 से 6:15 बजे  
  • शुभ-उत्तम मुहूर्त: सुबह 7:07 से 8:29 बजे  
  • अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:13 से 12:57 बजे  
  • लाभ-उन्नति मुहूर्त: दोपहर 12:35 से 1:57 बजे  
  • चंद्रोदय समय: रात 9:35 बजे (शहर के अनुसार थोड़ा अंतर संभव)

चंद्रोदय के बाद ही व्रत पूरा होता है। इसलिए भक्तों को रात 9:35 बजे के आसपास चंद्रदेव को अर्घ्य देना अनिवार्य है।

पूजा की विधि

  • संकष्टी चतुर्थी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र पहनकर संकल्प लें। हाथ में चावल और फूल लेकर गणेश जी के चरणों में संकल्प अर्पित करें।
  • पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं, कलावा बांधें और स्वस्तिक बनाएं। गणेश जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • फूल, माला, दूर्वा, सिंदूर, अक्षत, वस्त्र और लड्डू-मोदक का भोग लगाएं। घी का दीपक जलाएं। गणेश चालीसा, स्तुति, व्रत कथा और मंत्रों का पाठ करें।
  • शाम को चंद्रोदय से पहले दोबारा पूजा करें। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को जल, दूध, अक्षत और फूल से अर्घ्य दें। आरती के बाद व्रत पूरा करें।

गणेश जी की प्रसिद्ध आरती

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा  

एकदंत दयावंत चार भुजाधारी  

माथे सिंदूर सोहे, मूस की सवारी  

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा  

लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा  

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया  

बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया  

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी  

कामना को पूर्ण करो, जय बलिहारी  

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा  

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा

महत्व और मान्यता

हिंदू कैलेंडर में साल भर 24 संकष्टी चतुर्थी आती हैं। फाल्गुन मास की इस चतुर्थी को विशेष रूप से द्विजप्रिय संकष्टी कहा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से भक्तों के सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। व्रत रखने वाले भक्त दिनभर फलाहार करते हैं और शाम को चंद्र दर्शन के बाद ही पारण करते हैं।