नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से इस संभावना पर विचार करने को कहा कि क्या सोशल मीडिया मध्यस्थों और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए ऐसा कानूनी ढांचा तैयार किया जा सकता है, जिससे नाबालिगों से संबंधित भारतीय कानूनों का पालन अनिवार्य रूप से सुनिश्चित हो। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान देने को कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया पर स्वतंत्र रूप से अकाउंट न बना सकें और डिजिटल प्लेटफॉर्म उनके संबंध में लागू भारतीय कानूनी प्रावधानों का पालन करें।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ कर रही है। पीठ ने 10 सितंबर को इस मामले में याचिकाकर्ता गैर-सरकारी संगठन ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का की दलीलों पर संज्ञान लिया था। इसके बाद अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय से इस मुद्दे पर जवाब मांगा था। याचिका में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले नाबालिगों की सुरक्षा के लिए ठोस उपाय लागू करने की मांग की गई है।
याचिका में मांग की गई है कि कोई भी डिजिटल प्लेटफॉर्म 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के साथ सोशल मीडिया अकाउंट से संबंधित अनुबंध न करे। इसके लिए नाबालिगों को अकाउंट बनाने से पहले माता-पिता या अभिभावक की सहमति को अनिवार्य बनाने का सुझाव दिया गया है। साथ ही अभिभावक की पहचान सुनिश्चित करने के लिए ई-केवाईसी जैसी व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए केवल सामान्य दिशा-निर्देश पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि प्लेटफॉर्म पर इन प्रावधानों के पालन की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
सोमवार की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि सरकार इस पूरे मुद्दे पर विचार करेगी और उचित कदम उठाएगी। वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने दलील दी कि मौजूदा भारतीय कानून के तहत नाबालिगों द्वारा किए गए अनुबंध वैध नहीं माने जाते। ऐसे में डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए केवल स्वैच्छिक दिशा-निर्देश बनाने के बजाय बाध्यकारी कानूनी दायित्व निर्धारित किए जाने चाहिए, ताकि सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य प्लेटफॉर्म के लिए उनका पालन करना जरूरी हो।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि यह मामला केवल दिशा-निर्देश जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल से इस संभावना पर विचार करने को कहा कि क्या नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े इन प्रावधानों को मध्यस्थों से संबंधित नियमों के तहत वैधानिक व्यवस्था के रूप में शामिल किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मध्यस्थों से संबंधित नियमों के तहत ऐसे निर्देश दिए जा सकते हैं, जिनके मुताबिक सोशल मीडिया कंपनियों को अपने सॉफ्टवेयर और प्लेटफॉर्म को भारतीय कानूनों के अनुरूप तैयार करना हो। अदालत की ओर से यह सवाल भी उठाया गया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था भारतीय कानूनी प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता फुल्का ने अदालत के समक्ष कहा कि प्रस्तावित डाटा संरक्षण ढांचे के लागू होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मौजूदा भारतीय कानून में ही नाबालिगों के अनुबंध करने से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। याचिका में फेसबुक और स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि भारत में ऐसे कुछ प्लेटफॉर्म 13 वर्ष की उम्र से उपयोगकर्ताओं को अकाउंट बनाने की अनुमति देते हैं, जबकि भारतीय कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है। याचिका के अनुसार, इस अंतर को देखते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की मौजूदा उम्र संबंधी व्यवस्था और भारतीय कानूनी प्रावधानों के बीच तालमेल जरूरी है।
याचिका में बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से संबंधित सामग्री को फैलाने और संग्रहीत करने पर रोक लगाने वाले कड़े दंडात्मक प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि ऐसे कंटेंट के खिलाफ कानूनी प्रावधान मौजूद होने के बावजूद इंटरनेट प्लेटफॉर्म स्वचालित कंटेंट-फिल्टरिंग उपकरण और उम्र की पुष्टि करने वाली प्रभावी प्रणालियां लागू करने में नाकाम रहे हैं। याचिका में नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत करने, उनकी उम्र की पुष्टि करने, अभिभावकों की सहमति सुनिश्चित करने और डिजिटल प्लेटफॉर्म को भारतीय कानूनों के अनुरूप बनाने के लिए बाध्यकारी व्यवस्था की मांग की गई है। अब केंद्र सरकार को इस संबंध में कानूनी ढांचे की संभावना पर विचार करना है।







