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भारत में कुत्ते के काटने और रेबीज मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर चिंता

नेशनल डेस्क, श्रेया पांडेय |

हाल ही में भारत में आवारा कुत्तों द्वारा काटने की घटनाओं और रेबीज के मामलों में भारी वृद्धि देखी गई है, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने Times of India की एक रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया है। इस मामले में देशभर में सार्वजनिक चिंता गहराती जा रही है क्योंकि यह समस्या न केवल नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ी है बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा का रूप भी ले सकती है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल ने इस मुद्दे को और अधिक बल देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर की है, जिसमें उन्होंने एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम 2023 में संशोधन की मांग की है। उनका कहना है कि वर्तमान नियमों में कई कमियाँ हैं, जिनके कारण आवारा कुत्तों की संख्या पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। उन्होंने सुझाव दिया है कि बिना स्थानीय निगरानी के स्थानों पर घूम रहे कुत्तों को पकड़कर अन्यत्र भेजने, आवारा कुत्तों की राष्ट्रीय गिनती (census) कराने और सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना खिलाने पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है।

इस मामले में लोकसभा सांसद और कांग्रेस नेता कार्ति चिदंबरम ने भी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि भारत में रेबीज से मौतों के आंकड़े भारी रूप से कम आंकलित (underreported) हैं। कार्ति के अनुसार, भारत की राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) की रिपोर्ट बताती है कि 2024 में केवल 54 लोगों की मौतें रेबीज से दर्ज की गईं, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि भारत में प्रति वर्ष लगभग 20,000 मौतें इस बीमारी से होती हैं। यह अंतर दिखाता है कि सरकार के पास न तो पर्याप्त डेटा है और न ही इस संकट को नियंत्रण में लाने के लिए कोई प्रभावशाली नीति।

सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में हस्तक्षेप करना दर्शाता है कि अब यह मुद्दा केवल शहरी स्वच्छता या पशु अधिकारों से जुड़ा नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव जीवन की रक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दा बन चुका है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्यों से जवाब तलब किया है कि वे इस दिशा में क्या कदम उठा रहे हैं और क्या यह नियम वास्तव में प्रभावी हैं।

भारत के कई शहरों में आवारा कुत्तों की बेतहाशा बढ़ती संख्या, खासकर स्कूलों, अस्पतालों और पार्कों जैसे सार्वजनिक स्थलों में, अब बच्चों, वृद्धों और आम नागरिकों के लिए खतरा बन चुकी है। रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी का टीकाकरण भी सभी क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं है।

इस पृष्ठभूमि में, यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि सरकारें एकजुट होकर स्पष्ट और प्रभावी नीति बनाएं, जिससे आवारा कुत्तों पर नियंत्रण पाया जा सके और रेबीज जैसी बीमारियों से नागरिकों को बचाया जा सके। कोर्ट का यह संज्ञान एक सकारात्मक पहल है, जिससे उम्मीद की जा सकती है कि यह मुद्दा अब प्राथमिकता के साथ हल होगा