स्टेट डेस्क, श्रेयांश पराशर |
पटना हाई कोर्ट ने बिहार विशेष भूमि सर्वे को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भूमि सर्वे के नाम पर वर्षों पुराने कब्जे, पैतृक स्वामित्व और रैयती अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट की इस टिप्पणी को राज्य में चल रहे भूमि सर्वे के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।
हाई कोर्ट ने कहा कि भूमि का स्वामित्व केवल बिक्री विलेख (सेल डीड) या खतियान के आधार पर ही अंतिम रूप से तय नहीं किया जा सकता। भूमि से जुड़े स्वामित्व विवादों का अंतिम निर्णय करने का अधिकार केवल दीवानी अदालत (सिविल कोर्ट) को है। इसका अर्थ यह है कि सर्वे प्रक्रिया के दौरान किसी व्यक्ति के लंबे समय से चले आ रहे कब्जे या पारंपरिक अधिकारों को एकतरफा तरीके से खारिज नहीं किया जा सकता।
यह मामला खगड़िया जिले से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ताओं ने अपने पैतृक भूमि अधिकारों की रक्षा की मांग को लेकर हाई कोर्ट का रुख किया था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि विशेष भूमि सर्वे के दौरान उनके पूर्वजों से चली आ रही जमीन पर उनके अधिकारों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे उन्हें गंभीर नुकसान हो सकता है।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि सर्वे का उद्देश्य रिकॉर्ड को दुरुस्त करना है, न कि नागरिकों के वैध अधिकारों को छीनना। यदि किसी भूमि को लेकर विवाद है तो उसका समाधान विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत सिविल कोर्ट में ही होना चाहिए।
कानूनी जानकारों का मानना है कि इस फैसले से बिहार में चल रहे भूमि सर्वे के दौरान आम लोगों को बड़ी राहत मिलेगी। खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां पीढ़ियों से लोग जमीन पर काबिज हैं लेकिन उनके पास सीमित दस्तावेज हैं, वहां यह निर्णय उनके अधिकारों की सुरक्षा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।







