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मनुष्य का शरीर अदृश्य ऊर्जाओं का स्रोत: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: मनुष्य का शरीर ना जाने कितनी अदृश्य ऊर्जाओं का केंद्र है,कितनी ऊर्जा को छिपाया हुआ है,इस बात का किसी को अंदाजा नहीं है और  न ही कोई इस ऊर्जा की सीमा को जान पाया है।

उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।इसका अनुमान मात्र इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि किसी को आत्मज्ञान की या आंतरिक ऊर्जा की थोड़ी सी झलक भी मिलती है तो उतने में ही उसका जीवन अत्यंत प्रकाशित महसूस होता है। हर व्यक्ति के अंदर उसकी जीवात्मा में सूर्य के समान प्रकाश मौजूद है,लेकिन वह चित्त के आवरण में ढका रहता है।देखा जाये तो सूर्य और मनुष्य में बहुत सारी बातें एक समान हैं।दोनों में अनंत ऊर्जा समाहित है।दोनों में प्रकाश की कोई सीमा नहीं है।दोनों में ही दूसरों को जीवन देने की अद्भुत शक्ति है।आधुनिक विज्ञान के अनुसार भले ही सूर्य के पास व्यक्ति के तरह मन नहीं,लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से सूर्य इस जगत की आत्मा है,इस जगत का केंद्र है और सूर्य,परमात्मा का साक्षात् दृश्य रूप व प्रत्यक्ष देवता है।सूर्य निरंतर लोगों को अनुशासन,संतुलन व निरंतरता की सीख देता है।

उसका उदय और अस्त होना,दोनों ही विशेष है।सूर्य के चढ़ने और डूबने,दोनों के ही मायने हैं।इसलिए हमारे यहाँ छठ पर्व पर उसके दोनों ही रूपों की पूजा-आराधना की जाती है।सूर्य की यही दैनिक क्रिया है,उदय और अस्त।लेकिन इस तरह का भरोसा हम मनुष्य स्वयं पर नहीं कर पाते,अपनी ऊर्जा का अनुभव नहीं कर पाते,अपने प्रकाश को महसूस नहीं करते। "दूसरों से ईर्ष्या,जलन,शर्मिंदगी,संकोच व घृणा में हम अपनी बहुत सारी ऊर्जा बेकार एवं नष्ट कर देते हैं।"

खुद को साबित करने और प्रतिक्रिया देने में जुट जाते हैं।इसका परिणाम यह होता है कि हम अपनी मंजिल तक ही नहीं पहुँच पाते और बीच मार्ग में ही अपनी समस्त ऊर्जा खो देते हैं।यह स्थिति पढ़ाई,कैरियर,स्वास्थ्य,नौकरी,रिश्ते आदि सभी पर लागू होती है ; क्योंकि हम अपने कार्य व विश्राम के बीच संतुलन बनाना नहीं सीखते।यदि हमारे अंदर साहस व दृढ़ता की ऊष्मा है और बुरे-से-बुरे हालात में भी आशा व उम्मीद की किरण हमारे भीतर जिंदा है तो चाहे स्थिति कैसी भी हो,उस दौर में हमारी जीवन यात्रा सफल ही होती है।इस तरह हम अपनी सक्रिय ऊर्जा जो स्वयं के अंदर है उसका सदुपयोग करके सूर्य की भांति प्रकाशमान कर सकते हैं।अंदर से उभरी यह निर्भयता,हमारी ऊर्जा आंतरिक सूर्योदय के समान है।