लोकल डेस्क, सरोज चौरसिया ।
बीरगंज: अधिवक्ता शिव गणेश कर्नाटी ने कहा है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का आकलन केवल उसकी आर्थिक वृद्धि, तकनीकी विकास या वैश्विक प्रभाव से नहीं किया जा सकता, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में महिलाओं की स्थिति, गरिमा और सशक्तिकरण का स्तर कितना मजबूत है। उनका मानना है कि महिलाओं के अधिकार केवल कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि मूलभूत मानवाधिकार हैं, जिनकी रक्षा और सुनिश्चितता प्रत्येक सभ्य समाज की जिम्मेदारी है।
महिला सशक्तिकरण विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए अधिवक्ता कर्नाटी ने कहा कि इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि महिलाओं ने परिवार, समाज, व्यवसाय तथा राष्ट्र निर्माण में सदैव महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बावजूद आज भी विश्वभर में करोड़ों महिलाएँ विभिन्न प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही हैं, जो उन्हें अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँचने से रोकती हैं।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक महिला को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, नेतृत्व और न्याय तक समान पहुँच प्राप्त होनी चाहिए। जब महिलाएँ सशक्त होती हैं तो समाज प्रगति करता है और जब महिलाएँ सफल होती हैं तो उसका सकारात्मक प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचता है।
अधिवक्ता कर्नाटी ने शिक्षा को महिला सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि एक शिक्षित महिला केवल अपना जीवन ही नहीं बदलती, बल्कि अपने परिवार और पूरे समाज के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। विभिन्न अध्ययनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाएँ बेहतर रोजगार हासिल करती हैं, आर्थिक विकास में योगदान देती हैं तथा अपने बच्चों को स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य प्रदान करने में सक्षम होती हैं।
उन्होंने आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी महिला सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण आधार बताया। उनका कहना था कि आज महिलाएँ उद्यमी, वैज्ञानिक, शिक्षिका, वकील, प्रशासक और राजनीतिक नेता के रूप में विश्वभर में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं तथा नवाचार और विकास की नई मिसालें स्थापित कर रही हैं। हालांकि, वास्तविक समानता तभी संभव होगी जब लैंगिक भेदभाव, असमान वेतन, कार्यस्थलों पर उत्पीड़न और नेतृत्व के अवसरों में असमानता जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान किया जाएगा।
कर्नाटी ने सरकारों, शैक्षणिक संस्थानों और निजी क्षेत्र से महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने का आग्रह करते हुए कहा कि महिलाओं को उनकी योग्यता, क्षमता और प्रतिभा के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
एक विधि व्यवसायी के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने महिलाओं के संघर्ष और उनकी उपलब्धियों को बहुत करीब से देखा है। महिलाओं को भेदभाव, हिंसा और अन्याय से सुरक्षा प्रदान करने में कानून की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन केवल कानूनी प्रावधान ही पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविक परिवर्तन तब संभव होता है जब समाज सम्मान, समानता और अवसर की संस्कृति को स्वीकार करता है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं की सफलता को अपवाद नहीं, बल्कि समाज की सामान्य और स्वाभाविक स्थिति के रूप में देखा जाना चाहिए। आज महिलाएँ बोर्डरूम से लेकर न्यायालयों तक, कक्षाओं से लेकर प्रयोगशालाओं तक हर क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कर रही हैं। उनकी सफलता आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है।
अधिवक्ता कर्नाटी ने जोर देकर कहा कि महिला सशक्तिकरण केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। परिवारों को अपनी बेटियों को बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों को उनमें आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता विकसित करनी चाहिए। वहीं नियोक्ताओं को समान अवसर उपलब्ध कराने चाहिए तथा नीति-निर्माताओं को महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और समावेशिता को मजबूत करने वाली प्रभावी नीतियाँ लागू करनी चाहिए।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जब समाज महिलाओं को समान अवसर, सम्मान और सुरक्षा प्रदान करेगा, तभी एक न्यायपूर्ण, समावेशी और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण संभव हो सकेगा। महिला सशक्तिकरण केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि सतत विकास और राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है।







