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मोतिहारी में 'राष्ट्र के नाम मध्यस्थता 2.0' का आगाज, आपसी सहमति पर जोर

लोकल डेस्क, एन के सिंह।

मध्यस्थता को विवाद सुलझाने का सबसे सरल, सस्ता और प्रभावी माध्यम बताया गया, जिससे कोर्ट के चक्कर काटने से मिलेगी मुक्ति।

पूर्वी चंपारण: कानूनी पेचीदगियों और लंबी अदालती प्रक्रियाओं से आम जनता को राहत दिलाने के उद्देश्य से आज, 16 फरवरी 2026 को जिला विधिक सेवा प्राधिकार के कार्यालय परिसर में एक विशेष मध्यस्थता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। “राष्ट्र के नाम मध्यस्थता 2.0” अभियान के तहत आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य केंद्र जिला मध्यस्थता केंद्र रहा, जहाँ दर्जनों लंबित मामलों को आपसी समझौते के जरिए सुलझाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए।

न्यायाधीशों ने खुद संभाली कमान, वादकारियों को सिखाया सुलह का मंत्र

कार्यक्रम की महत्ता को देखते हुए प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अभिषेक कुमार दास ने स्वयं कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित होकर मध्यस्थता की कार्यवाही का बारीकी से अवलोकन किया। एक प्रशिक्षित मध्यस्थ के रूप में उन्होंने उपस्थित वादकारियों को मध्यस्थता के लाभ समझाते हुए कहा कि यह प्रक्रिया न केवल समय और धन की बचत करती है, बल्कि रिश्तों में कड़वाहट को खत्म कर आपसी सौहार्द को भी बढ़ावा देती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता के जरिए निकला समाधान दोनों पक्षों की जीत होती है, जिसमें कोई हारता नहीं है।

अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी और मार्गदर्शन

इस गरिमामयी आयोजन में न्यायिक जगत की प्रमुख हस्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी पुनीत कुमार तिवारी और जिला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव नितिन त्रिपाठी ने मध्यस्थता प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। वहीं, अनुभवी मध्यस्थों के रूप में रमाकांत पांडेय और ऋषि राज ने जटिल वादों को सुलझाने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। अधिकारियों ने जोर दिया कि न्यायालयों में बढ़ते मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए मध्यस्थता सबसे सशक्त माध्यम है।

त्वरित और सस्ता न्याय है मुख्य उद्देश्य

“राष्ट्र के नाम मध्यस्थता 2.0” का प्राथमिक उद्देश्य आम लोगों को इस वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के प्रति जागरूक करना है। इस अभियान के माध्यम से छोटे और आपसी विवादों को कोर्ट रूम की औपचारिक बहस से बाहर निकालकर टेबल पर बैठकर सुलझाने की कोशिश की जा रही है। जिला विधिक सेवा प्राधिकार के अनुसार, ऐसे कार्यक्रमों से समाज में कानूनी साक्षरता बढ़ती है और न्याय प्रणाली के प्रति लोगों का विश्वास और अधिक मजबूत होता है।