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युवा शक्ति को सही दिशा, शिक्षा और संस्कारों से बनेगा सशक्त समाज: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, मुस्कान सिंह ।

युवाओं के सपनों को दबाने से नहीं, उन्हें अवसर और सही मार्गदर्शन देने से राष्ट्र का भविष्य संवरता है। शिक्षा के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्य और विरोध के साथ विवेक का संतुलन ही एक जागरूक, जिम्मेदार और आदर्श समाज की नींव रखता है।

रक्सौल: किसी भी देश की वास्तविक शक्ति उसकी युवा पीढ़ी में निहित होती है। युवा केवल देश का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी ऊर्जा और बदलाव के महत्वपूर्ण वाहक भी हैं। उनके विचारों, सपनों और कार्यों से ही समाज की दिशा तय होती है। इसलिए यह जरूरी है कि युवाओं को केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन, अच्छे संस्कार और अपनी जिम्मेदारियों को समझने का अवसर भी मिले।

शिक्षा किसी भी व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबें पढ़ना, परीक्षा पास करना और डिग्री हासिल करना नहीं होना चाहिए। वास्तविक शिक्षा वह है, जो व्यक्ति को सही और गलत के बीच अंतर समझाए, दूसरों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करे और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का बोध कराए। यदि कोई व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना नहीं सीखता, तो उसकी शिक्षा अधूरी मानी जाएगी।

महान वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने हमेशा युवाओं को बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करने की प्रेरणा दी। उनका मानना था कि युवा अपनी सोच, ज्ञान और संकल्प से देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं। आज भी उनके विचार युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। जरूरत इस बात की है कि युवा अपनी क्षमता को पहचानें और उसका उपयोग सकारात्मक कार्यों में करें।

हालांकि, आज युवा पीढ़ी के सामने कई चुनौतियां भी हैं। शिक्षा का दबाव, रोजगार की चिंता, सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव, नशे की प्रवृत्ति और गलत संगति जैसी समस्याएं उनके व्यक्तित्व और भविष्य को प्रभावित कर रही हैं। कई बार विद्यार्थियों की समस्याओं को समय पर नहीं सुना जाता, जिससे उनके भीतर असंतोष पैदा होता है। ऐसी परिस्थितियों में शिक्षण संस्थानों और शिक्षकों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

विद्यार्थियों को अपनी बात रखने, सवाल पूछने और गलत व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने का पूरा अधिकार है। किसी भी शिक्षण संस्थान में विद्यार्थियों की समस्याओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लेकिन अधिकारों के साथ कर्तव्यों का पालन करना भी उतना ही जरूरी है। विरोध का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि हिंसा, तोड़फोड़ या अनुशासनहीनता। शांतिपूर्ण आंदोलन, संवाद और तर्क के माध्यम से अपनी बात रखना ही एक जिम्मेदार नागरिक की पहचान है।

इसी तरह शिक्षकों की भूमिका भी केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। शिक्षक विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्हें विद्यार्थियों की समस्याओं को समझना, उनकी प्रतिभा को पहचानना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। एक अच्छे शिक्षक की पहचान केवल उसके विद्यार्थियों के अंकों से नहीं, बल्कि उनके व्यवहार, सोच और चरित्र से भी होती है।

अभिभावकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। हर बच्चे की रुचि, क्षमता और सोच अलग होती है। किसी को विज्ञान में रुचि होती है, तो किसी को खेल, कला, साहित्य या अन्य क्षेत्रों में। बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपने और दूसरों से उनकी तुलना करने के बजाय उनकी प्रतिभा को समझना चाहिए। परिवार में संवाद और विश्वास का वातावरण बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

आज के समय में देश को केवल डिग्री हासिल करने वाले युवाओं की नहीं, बल्कि हुनरमंद, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिकों की आवश्यकता है। ऐसे युवा चाहिए जो अपनी शिक्षा का उपयोग समाज की समस्याओं को दूर करने में करें। डॉक्टर में सेवा की भावना, अधिकारी में ईमानदारी, शिक्षक में समर्पण और युवाओं में समाज के प्रति जिम्मेदारी होनी चाहिए। तभी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकेगा।

हमें यह भी समझना होगा कि युवाओं की ऊर्जा को दबाने के बजाय सही दिशा देना जरूरी है। खेलकूद, साहित्य, संगीत, कला, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सेवा जैसी गतिविधियों से युवाओं की प्रतिभा को निखारा जा सकता है। इससे उनमें नेतृत्व क्षमता, सहयोग, अनुशासन और सामाजिक संवेदनशीलता का विकास होगा। युवाओं को केवल समस्याओं की पहचान करना ही नहीं, बल्कि उनके समाधान के लिए आगे आने की प्रेरणा भी मिलनी चाहिए।

समाज और शिक्षण संस्थानों को ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जहां विद्यार्थी बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें और उनकी प्रतिभा को उचित अवसर मिल सके। असहमति को विरोध नहीं, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम समझना होगा। संवाद से समस्याओं का समाधान निकलता है और विश्वास से बेहतर संबंध बनते हैं।

अंततः किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल उसकी शिक्षा व्यवस्था या सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि उसकी युवा पीढ़ी के विचारों, संस्कारों और चरित्र से भी तय होता है। युवाओं को अवसर देना, उनकी समस्याओं को समझना और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। युवा शक्ति को भटकने से बचाने के लिए शिक्षा, संस्कार और संवाद को मजबूत करना होगा।

याद रखिए, युवा केवल देश की उम्मीद नहीं, बल्कि देश के निर्माण की सबसे बड़ी ताकत हैं। जब युवाओं के सपनों को सही दिशा, विचारों को सम्मान और प्रतिभा को अवसर मिलेगा, तभी एक शिक्षित, संवेदनशील और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव होगा।