विदेश डेस्क, आर्या कुमारी।
वाशिंगटन। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने रूस पर नए प्रतिबंधों को लेकर कहा है कि ट्रंप प्रशासन ने फिलहाल 60 दिनों का विराम लिया है। इस दौरान यह आकलन किया जाएगा कि रूस और भारत जैसे देशों पर बड़े पैमाने पर नए प्रतिबंध लगाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ सकता है। अमेरिका ने इसी सप्ताह लिंडसे ग्राहम एक्ट के तहत रूस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों में कुछ समय के लिए छूट देने का फैसला किया है।
रुबियो ने कहा कि मौजूदा समय में दुनिया पहले ही कई बड़े संकटों से गुजर रही है। यूक्रेन युद्ध, ईरान से जुड़ा संघर्ष और सऊदी अरब पर हूती के हमलों के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में काफी अस्थिरता बनी हुई है। उज्बेकिस्तान और भारत की यात्रा से पहले उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों से जुड़े कानून में छूट देने का एक कारण यह भी था कि इसके संभावित प्रभावों का अध्ययन करने के लिए कुछ समय जरूरी है। उनके मुताबिक, इस समय वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर कई तरह के दबाव मौजूद हैं।
तेल की कीमतों पर भी असर
रुबियो ने कहा कि वैश्विक तेल कीमतों में हो रही उथल-पुथल का कारण केवल ईरान या होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति नहीं है। सऊदी अरब पर हूती हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाए जाने का भी ऊर्जा बाजार पर असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इन सभी परिस्थितियों को एक साथ ध्यान में रखकर ही आगे की नीति तय करनी होगी, ताकि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर पड़ने वाले प्रभाव का सही आकलन किया जा सके।
भारत पर टैरिफ को लेकर क्या बोले रुबियो
रुबियो ने बताया कि लिंडसे ग्राहम एक्ट के प्रावधानों के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। ऐसे में भारत जैसे अमेरिकी साझेदार भी संभावित रूप से इस कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, रुबियो ने कहा कि भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीद जारी है। उनके मुताबिक, किसी देश के लिए रातों-रात अपने ऊर्जा स्रोत पूरी तरह बदलना आसान नहीं होता।
रुबियो ने कहा कि इसी वजह से अमेरिका को प्रतिबंधों के संभावित प्रभावों का अध्ययन करने और अलग-अलग परिस्थितियों के बीच उचित संतुलन तय करने के लिए समय चाहिए। उनका कहना था कि मौजूदा वैश्विक हालात में किसी भी फैसले का असर केवल एक देश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा बाजार और पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
अमेरिका-रूस के बीच डीजल समझौता
रूस से जुड़े प्रतिबंधों में दी गई छूट को 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले घरेलू ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश से भी जोड़कर देखा जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने पिछले सप्ताह रूस के साथ डीजल आपूर्ति को लेकर एक समझौता किया था। यह समझौता विवादों में रहा है, क्योंकि रूस से ऊर्जा खरीद पर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिकी राजनीति में भी मतभेद सामने आए हैं।
इस समझौते के तहत आने वाले महीनों में रूस अमेरिका और वैश्विक बाजार के लिए करीब 50 मिलियन टन डीजल की आपूर्ति कर सकता है। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि रूस से डीजल की आपूर्ति बढ़ने से बाजार में उपलब्धता बढ़ सकती है और ऊर्जा की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। वहीं, रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रावधानों के कारण इस नीति पर सवाल भी उठ रहे हैं।
रुबियो के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिका फिलहाल रूस से जुड़े नए प्रतिबंधों को लागू करने से पहले उनके व्यापक आर्थिक प्रभावों का आकलन करना चाहता है। खास तौर पर भारत जैसे बड़े ऊर्जा खरीदारों पर संभावित असर को भी इस समीक्षा में ध्यान में रखा जा रहा है। 60 दिनों के इस विराम के बाद अमेरिका प्रतिबंधों को किस रूप में लागू करेगा, इसे लेकर आगे की नीति पर फैसला लिया जाएगा।







