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लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पित बुद्धि जरूरी : बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: अगर आप कोशिश करने के लिए तैयार हैं,तो एक तरीका है उन सभी सीमाओं से परे जाने का जिन्हें मानवीय माना जाता है।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।

जीत सभी को चाहिए। सभी अपने जीवन में युद्ध लड़ते हैं,दो पक्षों में एक जीतता है, दूसरा हारता है। जो ईश्वर समर्पित बुद्धि से युद्ध लड़ता है वह जीतता है,अतः हमें निमित्त बनना सीखना होगा। ईश्वरीय आदेश को समझने की परख बढ़ानी होगी।अधर्मी और अन्यायी कभी ईश्वर अर्पित चेतना वाला नहीं हो सकते,जिसे अपने अन्याय की शक्ति पर ही दृढ़ विश्वास होता है,वही अन्याय करता है। जब हम सात्विक मन से अन्याय के विरुद्ध लड़ते हैं,तब हमारी जीत होती है। हमें सत्व प्रधान लड़ाई लड़नी ही चाहिए। ईश्वर का दिया वचन कभी विफल नहीं होता। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है-तुम्हारा सात्विक आरम्भ कभी नष्ट नहीं होगा,इसमें यदि प्रत्यक्ष हानि भी दिखे तो भी समझ लो, धर्म के लिए तुम्हारा किया युद्धारम्भ आगे सफल होगा ही,यह आरम्भ अनश्वर होता है।रोग नाश के लिए दी गयी दवा रोग को बढ़ा सकती है पर धर्म के निमित्त किया गया आपका प्रयास कभी नष्ट नहीं होगा,और इसमें विपरीत फल भी नहीं होता है।यह हमेशा समुचित फल ही देता है,जिस परिस्थिति को बदल पाना संभव ना हो उसको लेकर अपनी मनोस्थिति को बदल लीजिए।कुछ हद तक समाधान अवश्य मिलेगा,जब किसी व्यक्ति का "व्यक्तित्व" अच्छा होता है तभी लोग उसमें बुराइयाँ खोजते हैं,वरना बुरे की तरफ तो कोई देखता भी नहीं है।उसी का कार्य सिध्द होता है,जो समय को विचार कर कार्य करता है।शरीर में जो काम सांस का होता है,रिश्ते में वह काम विश्वास का होता है।किसी से असहमत होते हुए भी उसके प्रति आदरपूर्ण व्यवहार रखना परिपक्वता के अच्छे लक्ष्णों में से एक है।जीवन एक साइकिल है जिसके दो पहिए,हमारे सुख दुःख हैं।दोनों का गतिमान होना आवश्यक है।सुख हमें खुशी देता तो दुःख हमें अनुभव एवं आत्मविश्वास देता है साथ ही धैर्यवान भी बनाता है।