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लावरोव का अमेरिका को तीखा संदेश: बातचीत करो, टकराव छोड़ो

विदेश डेस्क, मुस्कान कुमारी।

मॉस्को। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अमेरिका की विदेश नीति पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने साफ कहा कि जब भी वॉशिंगटन को किसी देश की सरकार पसंद नहीं आती, तो उसे टकराव या धमकियों की जगह बातचीत से शुरुआत करनी चाहिए।

लावरोव ने गुरुवार को यहां दिए बयान में जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई भी देश अमेरिका के साथ टेबल पर बैठने से इनकार नहीं करता। फिर भी अमेरिका कूटनीति का रास्ता छोड़कर वादाखिलाफी करता है और दूसरे देशों पर अपना दबदबा थोपने की कोशिश करता है। उन्होंने कहा, “अमेरिका को यह आदत छोड़नी होगी।”

ईरान-क्यूबा जैसे मुद्दों पर निशाना
  
लावरोव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ईरान और क्यूबा पर लगातार दबाव बढ़ा रहा है। क्यूबा पहले ही बिना शर्त सम्मानजनक बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अमेरिका की ओर से धमकियां जारी हैं। लावरोव ने यही रवैया गलत बताया।

उन्होंने याद दिलाया कि रूस और चीन दोनों ही ईरान के मुद्दे पर कूटनीतिक समाधान का समर्थन करते हैं। दोनों देश अमेरिका की ‘एकतरफा कार्रवाई’ की नीति के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। लावरोव का संदेश साफ है- दबाव और प्रतिबंधों की बजाय संवाद ही सही रास्ता है।

मध्य पूर्व में तनाव के बीच महत्वपूर्ण बयान 
 
वर्तमान में मध्य पूर्व का हालात बेहद संवेदनशील है। लेबनान और इजरायल के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता में 10 दिन का युद्धविराम लागू हुआ है। इसी बीच लावरोव ने अमेरिका को चेतावनी दी कि वह अपनी मनमानी और वादे तोड़ने की आदत छोड़े।

रूसी विदेश मंत्री ने कहा कि जब भी अमेरिका किसी सरकार से नाखुश होता है तो तुरंत सैन्य धमकी या प्रतिबंध लगा देता है। यह रवैया दुनिया में अस्थिरता बढ़ाता है। उन्होंने जोर दिया कि बातचीत शुरू करने से पहले किसी भी देश ने अमेरिका से मना नहीं किया है। समस्या अमेरिका की वादाखिलाफी में है।

रूस की कूटनीतिक रणनीति

यह बयान रूस की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। मॉस्को लगातार अमेरिका की ‘दबदबे वाली नीति’ के खिलाफ खड़ा हो रहा है। लावरोव ने स्पष्ट किया कि रूस और चीन ईरान सहित अन्य मुद्दों पर एकजुट हैं और कूटनीति को ही प्राथमिकता देते हैं।

वैश्विक भू-राजनीति में यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि फिलहाल कई मोर्चों पर तनाव चरम पर है। लावरोव का संदेश अमेरिका को याद दिलाता है कि एकतरफा फैसले और धमकियां अब काम नहीं कर रही हैं। दुनिया अब संवाद चाहती है।