लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: वास्तविक गौरव वह है जो विचारशीलों द्वारा श्रद्धा सम्मानपूर्वक सहज स्वाभाविक रूप में प्रदान किया जाए। ऐसी गरिमा सज्जनता-शालीनता के बदले ही उपलब्ध होती है।
सद्गुणों की संपदा ही ऐसे ऊँचे स्तर की है कि उसके कारण अपनी छाप हर किसी के मन पर पड़ती है।इसी की प्रतिक्रिया गौरव गरिमा के रूप में अपने को उपलब्ध होती है। उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया। इसी का प्रतिफल आत्मसंतोष के रूप में हस्तगत होता है। थोपा हुआ बनावटी प्रदर्शन-बड़प्पन के आधार पर गढ़ा हुआ दिखावा केवल दूसरों की आँखों में चकाचौंध पैदा करता है। कुछ क्षण के लिए वस्तुस्थिति समझने से वंचित कर देता है पर यह स्थिति देर तक नहीं रहती।वस्तुस्थिति प्रकट होकर ही रहती है।
न भी हो तो भी किसी का वैभव किसी दूसरे को लाभान्वित नहीं करता।जिससे लाभ न हो उसके प्रति सहानुभूति कैसी ? दिखावा करके केवल यह सिद्ध किया जा सकता है कि प्रदर्शन के निमित्त किस हद तक पैसे और समय की बर्बादी की गई ? यह एक प्रकार से रिश्वत देकर ली गई वाहवाही है।इसकी जड़ें नहीं होती और होती भी हैं तो कमजोर होती हैं।बालू की भीत में टिकाऊपन कहाँ होता है ?पहले के समय में ये भ्रांति थी कि ठाट-बाट से जीवन यापन करने वाला लोगों को चकित करने वाला होता था,परंतु आज के समय में ये सब मिथ्या माना जाता एवं उसकी हरकतें ओछी की श्रेणी में गिनी जाती। विवेकवान पैसे का उपयोग समझते हैं।उसे नीतिपूर्वक ही कमाते हैं और नीति-मर्यादा के अनुरूप ही खर्च करते हैं।
अपव्यय का समर्थन चाटुकार,चापलूस ही कर सकते हैं।साहस,कौशल,विवेक जैसे सद्गुण भी सुक्ष्म स्तर के वैभव ही हैं।वितरण इनका भी होना चाहिए।धन का सम विभाजन औचित्य का प्रत्यक्ष स्वरूप है। उसे एक निमित्त तो माना जाना चाहिए पर यह नहीं समझ लेना चाहिए कि यही सब कुछ है,उसके अतिरिक्त अभ्युदय के लिए प्रचंड पुरुषार्थ भी एक बड़ी बात है। व्यक्तित्व को विकसित करने वाले सद्गुण भी एक पूँजी हैं।संपन्नता की तरह सज्जनता का अभिवर्धन,उन्नयन एवं समान वितरण होना चाहिए।गौरवशाली जीवन उन्हीं का है जो सबकी उन्नति एवं सबकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता मानते हैं।







