स्टेट डेस्क, आकाश अस्थाना।
- होसबाले ने राम जोइस की कृतियों से की तुलना। दत्तात्रेय होसबाले और अरुण कुमार से सुमित मिश्र की मुलाकात, भारतीय न्याय परंपरा, नए कानून और विकसित भारत में न्याय व्यवस्था की भूमिका पर हुआ मंथन।
नई दिल्ली: भारतीय न्याय परंपरा और नए विधिक सुधारों को केंद्र में रखकर लिखी गई पुस्तक ‘नवभारत का न्याय दर्शन’ अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच चर्चा का विषय बनी है। झंडेवालान स्थित संघ के केंद्रीय कार्यालय में लेखक एवं दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुमित कुमार मिश्र ने सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और सह सरकार्यवाह अरुण कुमार से मुलाकात कर उन्हें अपनी पुस्तक भेंट की। मुलाकात के दौरान भारतीय न्याय-दृष्टि, न्याय की मूल अवधारणा, दंड व्यवस्था, नए आपराधिक कानूनों और विकसित भारत के लक्ष्य में न्याय व्यवस्था की भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई। इस अवसर पर आरोग्य भारती के केंद्रीय कार्यालय मंत्री मिहिर कुमार झा भी मौजूद रहे।
होसबाले ने राम जोइस की कृतियों से जोड़ा पुस्तक का अध्ययन
‘नवभारत का न्याय दर्शन’ की विषय-वस्तु पर चर्चा के दौरान दत्तात्रेय होसबाले ने पुस्तक की तुलना न्यायमूर्ति एम. राम जोइस की महत्वपूर्ण कृतियों Legal and Constitutional History of India और Seeds of Modern Public Law in Ancient Indian Jurisprudence से की।
उन्होंने भारतीय न्याय और संवैधानिक परंपरा को समझने के लिए ऐसे गंभीर अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया और सुमित कुमार मिश्र के प्रयास की सराहना की। संघ सरकार्यवाह द्वारा राम जोइस की कृतियों के संदर्भ में पुस्तक का उल्लेख किए जाने को लेखक के अध्ययन और पुस्तक की विषय-वस्तु के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अरुण कुमार ने कहा: भारतीय दृष्टि के बिना न्याय की पूरी समझ संभव नहीं
सह सरकार्यवाह अरुण कुमार ने न्याय की भारतीय अवधारणा पर जोर देते हुए कहा कि न्याय को केवल कानून, अदालत और दंड की व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जा सकता। भारतीय परंपरा में न्याय का संबंध कर्तव्य, नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और लोककल्याण से भी रहा है।
उन्होंने कहा कि समकालीन विधिक व्यवस्था को भारतीय दृष्टि और सामाजिक संदर्भों से जोड़कर देखने का प्रयास महत्वपूर्ण है। उन्होंने ‘नवभारत का न्याय दर्शन’ के अध्ययन और लेखन प्रयास की सराहना करते हुए इसे वर्तमान समय में प्रासंगिक विमर्श बताया।
नए आपराधिक कानूनों से विकसित भारत तक पुस्तक का फोकस
‘नवभारत का न्याय दर्शन’ में 1 जुलाई 2024 से लागू नए आपराधिक कानूनों और देश में हुए व्यापक विधिक सुधारों की पृष्ठभूमि में भारतीय न्याय-दृष्टि को समझने का प्रयास किया गया है। पुस्तक औपनिवेशिक दौर की कानूनी विरासत से आगे बढ़ते हुए भारतीय संदर्भ में न्याय की अवधारणा और आधुनिक विधिक व्यवस्था के बीच संबंधों पर विमर्श करती है।
पुस्तक में विकसित भारत 2047 के संकल्प के संदर्भ में न्याय व्यवस्था की भूमिका को भी प्रमुखता दी गई है। लेखक के अनुसार विकसित भारत केवल आर्थिक और भौतिक प्रगति का लक्ष्य नहीं, बल्कि ऐसी न्याय व्यवस्था का निर्माण भी है जो नागरिकों को समयबद्ध, सुलभ और प्रभावी न्याय उपलब्ध करा सके।
राम बहादुर राय ने लिखी पुस्तक की प्रस्तावना
पुस्तक की प्रस्तावना पद्म भूषण राम बहादुर राय ने लिखी है। इसमें भारतीय न्याय परंपरा, न्याय की अवधारणा, दंड व्यवस्था, विधिक सुधार और समकालीन न्याय व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं को केंद्र में रखा गया है।
सुमित मिश्र बोले: न्याय को राष्ट्र निर्माण के व्यापक संदर्भ में देखना होगा
मुलाकात के बाद सुमित कुमार मिश्र ने कहा कि ‘नवभारत का न्याय दर्शन’ लिखने का उद्देश्य भारतीय न्याय परंपरा, वर्तमान विधिक सुधारों और विकसित भारत के संकल्प के बीच संवाद स्थापित करना है। न्याय को केवल अदालत और कानूनी प्रक्रिया तक सीमित न रखकर राष्ट्र निर्माण, सामाजिक उत्तरदायित्व और लोककल्याण के व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। झंडेवालान स्थित संघ कार्यालय में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और सह सरकार्यवाह अरुण कुमार को पुस्तक भेंट करने और भारतीय न्याय-दृष्टि पर हुई चर्चा को सुमित मिश्र ने अपने लेखकीय प्रयास के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया।







