नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।
नई दिल्ली। विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की कानूनी उम्र 18 वर्ष से कम करने की किसी भी संभावना का कड़ा विरोध किया है। वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि किशोरावस्था में बच्चे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से इतने परिपक्व नहीं होते कि वे इस तरह के महत्वपूर्ण निर्णय सही ढंग से ले सकें। उन्होंने कहा कि इस विषय को केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि परिवार, समाज और युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखकर देखा जाना चाहिए।
सांस्कृतिक गौरव संस्थान की ओर से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित ‘किशोरों के सहमति वाले संबंध- चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और कानूनी दृष्टिकोण’ विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए आलोक कुमार ने लोगों से इस मुद्दे पर व्यक्तिगत स्तर पर भी विचार करने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने परिवार की किसी किशोरी के संदर्भ में यह सोचना चाहिए कि क्या वह इस उम्र में ऐसे संबंधों के लिए शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से तैयार है। उनके अनुसार, अधिकांश मामलों में इसका उत्तर ‘नहीं’ होगा और इसलिए सहमति की उम्र में किसी प्रकार की कमी उचित नहीं मानी जा सकती।
आलोक कुमार ने हाल में नीट पेपर लीक के विरोध में हुए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान कुछ किशोर ऐसे बैनर लेकर चल रहे थे, जिन पर यौन संबंधी स्पष्ट शब्दों और अभिव्यक्तियों का प्रयोग किया गया था। उनके अनुसार, इस तरह की भाषा और प्रतीकों का सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल समाज में अशोभनीय व्यवहार और शब्दावली को सामान्य बनाने की कोशिश को दर्शाता है, जो सामाजिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय है।
वीएचपी अध्यक्ष ने चेतावनी दी कि यदि सहमति से संबंध बनाने की उम्र 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष या उससे कम की जाती है, तो इसका सीधा प्रभाव विवाह और परिवार जैसी सामाजिक संस्थाओं पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि ऐसे बदलाव केवल कानूनी संशोधन नहीं होंगे, बल्कि पारिवारिक व्यवस्था, सामाजिक मूल्यों और पारंपरिक संस्थाओं की नींव को भी प्रभावित करेंगे। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या समाज वास्तव में इस प्रकार के बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार है।
वीएचपी के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा कि सहमति की उम्र में बदलाव जैसे संवेदनशील विषय पर समाज और संसद में व्यापक चर्चा होनी चाहिए। उनका कहना था कि इस प्रकार के फैसले केवल न्यायिक टिप्पणियों के आधार पर नहीं लिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि किशोरावस्था शिक्षा, ज्ञान अर्जित करने और भविष्य के निर्माण की उम्र होती है, इसलिए इसे प्रयोग या जोखिम भरे निर्णयों की आयु के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सुरेंद्र जैन ने कहा कि भारतीय कानून पहले से ही 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को कई महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय लेने के लिए पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं मानता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मतदान का अधिकार 18 वर्ष की आयु के बाद ही मिलता है और भारतीय संविदा अधिनियम के तहत नाबालिग किसी वैध अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं कर सकता। उनके अनुसार, यह दर्शाता है कि कानून भी इस आयु से पहले पूर्ण निर्णय क्षमता को स्वीकार नहीं करता। उन्होंने कहा कि युवाओं को संरक्षण देने की आवश्यकता है और इस विषय पर होने वाली बहस केवल संगोष्ठियों तक सीमित न रहकर पूरे समाज तक पहुंचनी चाहिए।







