स्टेट डेस्क, आकाश अस्थाना।
- कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के नेतृत्व की सराहना करते हुए विश्वविद्यालय की निरंतर प्रगति हेतु शुभकामनाएँ प्रदान कीं।
नई दिल्ली। श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का शैक्षणिक एवं आध्यात्मिक वातावरण उस समय विशेष रूप से गरिमामय हो उठा, जब शांभवी पीठ के पीठाधीश्वर परम पूज्य स्वामी आनंद स्वरूप भारती विश्वविद्यालय में कृपापूर्वक पधारे। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने उनका आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया। इस अवसर पर दोनों के मध्य संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, मूल्यपरक शिक्षा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण तथा विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की भूमिका जैसे विविध समसामयिक एवं राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर सार्थक विचार-विमर्श हुआ।
स्वामी आनंद स्वरूप भारती ने विश्वविद्यालय की निरंतर प्रगति, शैक्षणिक उत्कृष्टता तथा अनुसंधान गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान-विज्ञान परंपरा, दर्शन, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित जीवन-दर्शन, नैतिक मूल्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज भी संपूर्ण मानवता के लिए समान रूप से प्रासंगिक हैं। यदि संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से प्रभावी ढंग से जोड़ा जाए तो भारत पुनः विश्व को ज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में दिशा प्रदान करने में सक्षम होगा।उन्होंने कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के नेतृत्व की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके कुशल मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय संस्कृत शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित कर रहा है। उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार को निरंतर प्रगति, शैक्षणिक उत्कृष्टता तथा संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के राष्ट्रीय एवं वैश्विक विस्तार के लिए अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ एवं मंगलकामनाएँ प्रदान कीं। साथ ही संस्कृत, सनातन संस्कृति एवं भारतीय जीवन मूल्यों के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए हरसंभव सहयोग का आश्वासन भी दिया।बैठक के दौरान इस बात पर विशेष बल दिया गया कि भारत की समृद्ध वैदिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने के लिए शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों तथा आध्यात्मिक संस्थाओं के समन्वित प्रयास समय की प्रमुख आवश्यकता हैं। शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण, संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार, भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, सनातन जीवन मूल्यों के संवर्धन तथा युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने जैसे विषयों पर भी सकारात्मक एवं दूरदर्शी चर्चा हुई।इस अवसर पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने विश्वविद्यालय द्वारा संस्कृत, भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक अध्ययन, दर्शन, योग तथा मूल्यपरक शिक्षा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए संचालित शैक्षणिक, अनुसंधानात्मक एवं नवाचारपरक गतिविधियों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा के मुख्य प्रवाह से जोड़ना विश्वविद्यालय की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।
विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल संस्कृत भाषा का संरक्षण करना नहीं, बल्कि उसे समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप समाजोपयोगी, शोधोन्मुख तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करना भी है।कार्यक्रम में टाइम्स फाउंडेशन के मुख्य कार्यपालक अधिकारी सजीव कोरवा भी उपस्थित रहे। उन्होंने शिक्षा, संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन के लिए विश्वविद्यालय, सामाजिक संगठनों एवं आध्यात्मिक संस्थाओं के बीच समन्वित प्रयासों को समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि सामूहिक सहभागिता से ही भारत की गौरवशाली ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुँचाया जा सकता है।सौहार्दपूर्ण, आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायी वातावरण में संपन्न इस कार्यक्रम ने शिक्षा, संस्कृति और अध्यात्म के समन्वित प्रयासों के महत्व को पुनः रेखांकित किया। उपस्थित सभी जनों ने एक स्वर में विश्वास व्यक्त किया कि संस्कृत, भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग की सक्रिय सहभागिता आवश्यक है। यह अवसर भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार, संस्कृत भाषा के उन्नयन तथा विकसित भारत के निर्माण के साझा संकल्प को और अधिक सुदृढ़ करने वाला सिद्ध हुआ।







