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हर दिन जन्म व हर रात मौत ही तत्वबोध है: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज।

रक्सौल: 'आत्म बोध' और 'तत्व बोध' सद्ज्ञान की यह दो धाराएं हिमालय से निकलने वाली पतित पावनी गंगा और तरन तारिणी यमुना की तरह है।

आत्म-बोध का अर्थ है अपने उद्गम,स्वरूप,उत्तरदायित्व एवं लक्ष्य को समझना,तदनुरूप दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप का निर्धारण करना। उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया। तत्व-बोध का अर्थ है शरीर, उसके उपयोग अंत के सम्बन्ध में वस्तुस्थिति से परिचित होना।संक्षेप में चेतना की सत्ता की यथार्थता को समझना,आत्म-बोध और उसके काम आने वाले पदार्थों एवं प्राणियों के साथ उचित तालमेल बिठाने को तत्वबोध कहते हैं।

"हर दिन नया जन्म - हर रात नई मौत" का सूत्र आत्म-बोध और तत्व-बोध की दोनों साधनाओं का प्रयोजन पूरा करता है।प्रातःकाल नींद खुलते ही हर रोज यह भावना जागृत करनी चाहिए कि आज हमारा नवीनतम जन्म हुआ है और वह सोते समय तक एक रोज के लिए ही है। इसे हर दृष्टि से श्रेष्ठतम और आदर्श रीति-नीति अपनाते हुए जिया जाय। इसके लिए शैय्या त्याग से लेकर रात को सोते समय तक का कार्यक्रम बनाना चाहिए।रात्रि को सोते समय यह मानकर निद्रा की गोद में जाना चाहिए कि यह जीवन के एक अध्याय का संतोषजनक अंत हुआ।अब मृत्यु जैसी शांति को गले से लगाना है।

रात्रि निद्रा को दैनिक मृत्यु माना जय।इससे अति महत्वपूर्ण आध्यात्मिक लाभ मिलता है।हम मृत्यु को एक प्रकार से भूले रहते हैं,अस्तु जीवन का मूल्य और स्वरूप समझ पाना ही हमारे लिए संभव नहीं हो पाता।आम तौर से जब तक वस्तु हमारे हाथ में रहती है,तब तक उसका न तो महत्व समझ में आता है और न उसका उपयोग।जब वह छिन जाती है,तब पता चलता है कि वह उपलब्धि कितना बड़ा सौभाग्य थी।उसका समय रहते कितना अच्छा सदुपयोग हो सकता था।जीवन का आनंद उसे मिलता जो खिलाड़ियों द्वारा खेले जाने वाले खेल की तरह जीता है।यही आत्मबोध एवं तत्वबोध की संक्षेप में परिभाषा है।