लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: मनुष्य का जीवन भावनाओं से भरा हुआ है। प्रेम, घृणा, सफलता, असफलता, खुशी, दुख, ईर्ष्या और जलन—ये सभी भावनाएँ हमारे व्यवहार और रिश्तों को प्रभावित करती हैं। लेकिन आज के बदलते समाज में एक सवाल बार-बार सामने आता है कि हम दूसरों की खुशी में खुश होने के बजाय उनकी सफलता से परेशान क्यों होने लगे हैं?
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई (जोन - 41 सत्र 26-27) के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
आज सोशल मीडिया और दिखावे के दौर में व्यक्ति अपने जीवन की तुलना दूसरों से अधिक करने लगा है। किसी की तरक्की देखकर प्रेरणा लेने के बजाय मन में ईर्ष्या पैदा होना आम होता जा रहा है। किसी के पास बेहतर घर, अच्छी नौकरी, अधिक धन या सम्मान है तो हम अपनी उपलब्धियों को कम समझने लगते हैं। यही तुलना धीरे-धीरे जलन और नकारात्मक सोच को जन्म देती है।
सफलता हर व्यक्ति की अपनी होती है। किसी के लिए बड़ी नौकरी सफलता है, तो किसी के लिए परिवार की खुशी। किसी के लिए धन महत्वपूर्ण है, तो किसी के लिए सम्मान और आत्मसंतोष। इसलिए दूसरों की सफलता को देखकर खुद को असफल समझना उचित नहीं है। हमें यह समझना चाहिए कि हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ, संघर्ष और यात्रा अलग होती है।
इसी तरह असफलता भी जीवन का अंत नहीं, बल्कि सीखने का अवसर है। असफलता हमें अपनी गलतियों को पहचानने और बेहतर तरीके से आगे बढ़ने का मौका देती है। जो व्यक्ति असफलता से सीखता है, वही भविष्य में बड़ी सफलता की मजबूत नींव तैयार करता है।
आज समाज में प्रेम और घृणा के बीच की दूरी भी कम होती दिखाई देती है। छोटी-सी बात पर रिश्ते टूट जाते हैं और वर्षों का अपनापन पलभर में समाप्त हो जाता है। इसका एक बड़ा कारण है—अहम, गलतफहमी और संवाद की कमी। हम दूसरों को समझने से पहले उनके बारे में राय बना लेते हैं।
हमें यह याद रखना चाहिए कि प्रेम केवल शब्द नहीं, बल्कि व्यवहार है और सम्मान केवल मांगने की चीज नहीं, बल्कि देने की आदत है। यदि हम दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय उससे प्रेरणा लें, असफलता से निराश होने के बजाय उससे सीखें और घृणा के स्थान पर संवाद को महत्व दें, तो समाज अधिक सुंदर और शांत बन सकता है।
जीवन बहुत छोटा है। इसमें दूसरों को पीछे खींचने, उनकी खुशियों से जलने और नफरत पालने के लिए समय नहीं होना चाहिए। हमें अपनी ऊर्जा दूसरों से मुकाबला करने में नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने में लगानी चाहिए।
किसी की सफलता हमारी हार नहीं है और किसी की खुशी हमारी कमी नहीं है। सच्ची सफलता तब है, जब हम स्वयं आगे बढ़ें और दूसरों को भी आगे बढ़ते देखकर खुश हो सकें।
आज के समाज को ईर्ष्या नहीं, प्रेरणा चाहिए; घृणा नहीं, प्रेम चाहिए; तुलना नहीं, सहयोग चाहिए। क्योंकि जिस दिन हम दूसरों की सफलता में अपनी खुशी तलाशना सीख जाएंगे, उसी दिन समाज में रिश्तों की खूबसूरती और जीवन की सच्ची खुशी लौटने लगेगी।







