लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: सामाजिक जीवन में ग्लानि,भय एवं हीनता तथा इनसे उत्पन्न उद्वेग के भाव ऐसे भँवर के समान है,जो व्यक्ति की क्षमताओं को कुंद कर देते हैं।
उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।साथ ही ये सब मिलकर जीवन को असहज एवं असामान्य बना देते हैं,जिनसे व्यक्ति का सामाजिक एवं पेशेवर जीवन प्रभावित होता है,साथ ही व्यक्ति गहरे तनाव-अवसाद में जीने के लिए अभिशप्त भी होता है।हम इंसान इस तनाव से जितनी जल्दी उबर सके,उतना ही व्यक्तित्व के उत्कर्ष की दृष्टि से अभीष्ट रहता है,लेकिन यदि ये स्वभाव के अंग बन चुके हैं,तो कार्य थोड़ा समयसाध्य हो जाता है।
ऐसे में धैर्य एवं सूझ भरे दृढ़ कदमों के साथ ही इनसे पार पाया जा सकता है।सबसे पहले आवश्यक होता है कि पहले अपने नकारात्मक आत्मसंवाद को समझें व स्वयं को स्वीकार करें।इससे जितना जल्दी व दृढ़ता से निपटा जाए,उतना ही उत्तम रहता है। लंबे समय तक की नकारात्मक सोच एवं क्रियाओं ने इनको इतनी गहरी जड़ें जमाने का अवसर दिया है कि अब ये जैसे पूरे व्यक्तित्व पर अपना अधिकार जमा बैठे हैं।इसके उपचार में सामान्य प्रयासों से कुछ सार्थक होने वाला नहीं।इनको जड़ से उखाड़ फेंकने या इनको रूपांतरित करने के लिए इनके विरुद्ध एक तरह से धर्मयुद्ध छेड़ने की आवश्यकता होती है,लेकिन इसके लिए पहला कदम रहता है इनको स्वीकारने व समझने का और फिर इसके साथ चिंतन के नए तौर-तरीके एवं जीवनशैली को अपनाने का।सकारात्मक स्व अवधारणा ,इसका पूरक चरण है,जिसमें अपने प्रति सम्मान एवं गौरव का भाव पैदा किया जाता है।इसके लिए सकारात्मक आत्मसंवाद की आवश्यकता होती है,जिसके तहत स्व की अवधारणा की नैतिकता एवं सामाजिक दायरे से आगे बढ़ाकर आध्यात्मिक आयाम से जोड़ना होता है,जिससे कि गहनतम स्तर पर आत्मसम्मान का भाव विकसित हो सके।







