लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: जीवन और मृत्यु संसार के दो ऐसे सत्य हैं, जिन्हें मनुष्य चाहकर भी बदल नहीं सकता। जन्म के साथ जीवन की यात्रा शुरू होती है और मृत्यु के साथ उसका एक पड़ाव समाप्त होता है। लेकिन वास्तव में मृत्यु अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन का एक स्वाभाविक क्रम है। जिस व्यक्ति को जीवन के इस सत्य का बोध हो जाता है, वह न मृत्यु से भयभीत होता है और न ही मृत्यु के सामने अपना विवेक खोता है।
लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी बिमल सर्राफ ने कहा कि मनुष्य को संसार को एक विशाल चौराहे की तरह समझना चाहिए। जिस प्रकार किसी चौराहे पर लोग अलग-अलग दिशाओं से आते हैं और कुछ समय बाद अपनी-अपनी मंजिल की ओर चले जाते हैं, उसी प्रकार संसार में भी मनुष्यों का आना-जाना निरंतर चलता रहता है। कोई जन्म लेकर आता है तो कोई अपनी जीवन-यात्रा पूरी करके चला जाता है। यह प्रकृति का शाश्वत नियम है।
उन्होंने कहा कि हम अक्सर जन्म को खुशी और मृत्यु को केवल दुःख के रूप में देखते हैं। इसका कारण यह है कि हम जीवन को उसके वास्तविक स्वरूप में समझने के बजाय उसे केवल अपने रिश्तों, इच्छाओं और मोह के आधार पर देखते हैं। जब हमारा कोई अपना हमसे दूर होता है तो हमें लगता है कि सब कुछ समाप्त हो गया। लेकिन प्रकृति के व्यापक सत्य में देखें तो कुछ भी समाप्त नहीं होता, केवल उसका रूप बदलता है।
जीवन में सुख और दुःख भी इसी परिवर्तनशीलता का हिस्सा हैं। आज जो सुख है, वह कल दुःख में बदल सकता है और आज का दुःख आने वाले समय में किसी नए सुख का कारण बन सकता है। यही जीवन की प्रकृति है। परिस्थितियाँ कभी स्थायी नहीं रहतीं। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि मनुष्य सुख में अहंकार न करे और दुःख में निराश होकर टूट न जाए।
उन्होंने कहा कि मृत्यु का सबसे बड़ा दुःख शरीर के नष्ट होने से अधिक उस मोह का है, जो मनुष्य ने शरीर और संसार से जोड़ रखा है। जब व्यक्ति यह समझने लगता है कि जीवन केवल शरीर का नाम नहीं है, तब उसके भीतर मृत्यु के प्रति दृष्टिकोण भी बदलने लगता है। आत्मबोध मनुष्य को भय और शोक से ऊपर उठाकर शांति की ओर ले जाता है।
आज मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं की तलाश में लगातार भाग रहा है, लेकिन वास्तविक आनंद उसके भीतर छिपा हुआ है। धन, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक उपलब्धियाँ जीवन को सुविधाजनक बना सकती हैं, लेकिन स्थायी शांति नहीं दे सकतीं। सच्चा आनंद तब मिलता है, जब मनुष्य अपने भीतर की अशांति, चिंता, अहंकार और अनावश्यक मोह से मुक्त होने का प्रयास करता है।
उन्होंने कहा कि हमें जीवन को केवल प्राप्त करने और खोने की दृष्टि से नहीं, बल्कि सीखने और समझने की दृष्टि से देखना चाहिए। हर जन्म हमें कुछ नया सिखाता है और हर मृत्यु हमें जीवन की अनिश्चितता का बोध कराती है। इसलिए मृत्यु हमें डराने के बजाय जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देनी चाहिए।
मनुष्य के पास समय सीमित है। इसलिए उसे दूसरों से ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिस्पर्धा में जीवन नष्ट करने के बजाय प्रेम, करुणा, सेवा और सद्भाव को अपने जीवन का आधार बनाना चाहिए। जब हम समझ लेते हैं कि संसार में हमारा ठहराव भी चौराहे पर खड़े यात्री की तरह कुछ समय के लिए है, तब हमारे भीतर अनावश्यक अहंकार और मोह स्वतः कम होने लगता है।
अंततः जीवन का सार यही है कि जन्म और मृत्यु प्रकृति के दो छोर नहीं, बल्कि एक ही निरंतर यात्रा के दो पड़ाव हैं। जो व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार कर लेता है, वह परिस्थितियों से विचलित होने के बजाय संतुलित रहना सीखता है। वह मृत्यु से भयभीत होकर जीवन नहीं जीता, बल्कि जीवन को प्रेम, सेवा, सद्भाव और आनंद के साथ जीने का प्रयास करता है।
यही जीवन की वास्तविक समझ है और यही आत्मबोध मनुष्य को बाहरी परिस्थितियों से ऊपर उठाकर उस आंतरिक आनंद तक ले जाता है, जहाँ भय और चिंता के लिए कोई स्थान नहीं रहता।







