लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: समय और परिस्थिति पर आज तक किसी का वश नहीं रहा है। ये कब और कैसे बदल जाएँ, कोई नहीं जानता। आज जो परिस्थिति हमारे अनुकूल है, वह कल प्रतिकूल भी हो सकती है। इसलिए जीवन में चाहे कितनी भी सफलता, संपत्ति या शक्ति क्यों न मिल जाए, मनुष्य को हमेशा सहज, सरल और विनम्र बने रहना चाहिए।
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
उन्होंने कहा कि यह पूरा संसार भगवान की एक लीला और नाटक के समान है। इस संसार में सृजन भी है और संहार भी, सुख भी है और दुःख भी। वर्तमान समय में युद्ध और हिंसा के रूप में विनाश की लीला दिखाई दे रही है, लेकिन संसार में परिवर्तन का यह क्रम हमेशा चलता रहता है। जीवन का वास्तविक आनंद इस बात में है कि हम परिस्थितियों के बीच अपने मन को संतुलित और सकारात्मक बनाए रखें।
उन्होंने कहा कि दुनिया को देखने का नजरिया ही हमारे सुख और दुःख को तय करता है। जो व्यक्ति संसार के प्रत्येक प्राणी और प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर का भाव देखता है, उसके लिए जीवन आनंदमय बन जाता है। वहीं जो व्यक्ति केवल बाहरी परिस्थितियों को देखकर जीवन का मूल्यांकन करता है, उसके भीतर असंतोष और दुःख बढ़ता जाता है।
मनुष्य के भीतर अच्छाई और बुराई का संघर्ष भी लगातार चलता रहता है। इसका उदाहरण रामायण के पात्रों से समझा जा सकता है। लंका जैसे वातावरण में रहकर भी विभीषण भगवान का नाम लेते रहे, जबकि अयोध्या में रहकर भी मंथरा अपने नकारात्मक विचारों और कलह से मुक्त नहीं हो सकी। इससे स्पष्ट है कि स्थान से अधिक महत्वपूर्ण हमारा मन और हमारा ध्यान है।
उन्होंने कहा कि केवल मथुरा, काशी या किसी तीर्थस्थल की यात्रा करने से मन पवित्र नहीं हो जाता। वास्तविक तीर्थ तो हमारा मन है। हमारे भीतर चल रहे अच्छाई और बुराई के युद्ध में हमें सावधान रहना चाहिए कि हमारे विचार रावण के अवगुणों की ओर नहीं, बल्कि भगवान राम के सद्गुणों की ओर आगे बढ़ें।
बिमल सर्राफ ने कहा कि धनवान बनने के लिए एक-एक कण जोड़ना पड़ता है, जबकि गुणवान बनने के लिए एक-एक क्षण का सदुपयोग करना पड़ता है। धन-संपत्ति इस जीवन तक सीमित रह सकती है, लेकिन अच्छे कर्म और पुण्य मनुष्य के जीवन को लंबे समय तक सार्थक बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि झूठ कभी भी बेहतर विकल्प नहीं हो सकता। दूसरों से बोला गया झूठ भले ही कुछ समय के लिए स्वार्थ पूरा कर दे, लेकिन धीरे-धीरे विश्वास, सामाजिक प्रतिष्ठा और मानवीय संबंधों को कमजोर कर देता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जब मनुष्य स्वयं से झूठ बोलता है, तो उसका प्रभाव सबसे पहले उसी के व्यक्तित्व और मन पर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि जब समय और परिस्थितियाँ हमारे पक्ष में हों, तब किसी का अपमान नहीं करना चाहिए और न ही किसी को कमजोर या कमतर समझना चाहिए। आज हम शक्तिशाली और समृद्ध हो सकते हैं, लेकिन समय हमसे कहीं अधिक शक्तिशाली है। इतिहास इस बात का गवाह है कि समय ने बड़े-बड़े सम्राटों और शक्तिशाली लोगों को भी बदलकर रख दिया।
इसलिए सफलता मिलने पर अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता बढ़नी चाहिए। जीवन में परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, व्यक्ति को अपने व्यवहार और शब्दों पर नियंत्रण रखना चाहिए। मन खराब हो तो भी किसी को खराब शब्द नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि मन बाद में ठीक हो सकता है, लेकिन मुँह से निकले हुए शब्द वापस नहीं लिए जा सकते।
उन्होंने कहा कि तनाव को संभालना भी जीवन की एक बड़ी कला है। जो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों और तनाव के बीच स्वयं को संतुलित रखना सीख लेता है, वही वास्तविक सफलता का आनंद उठा सकता है। यदि हम तनाव को नहीं संभाल सकते, तो सफलता को भी लंबे समय तक संभाल पाना कठिन है।
अंततः उन्होंने कहा कि जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती-जाती रहती हैं। हमारे हाथ में समय और परिस्थिति को बदलना नहीं, बल्कि उनके बीच अपने विचार, व्यवहार और कर्मों को सही दिशा देना है। इसलिए अच्छे समय में घमंड न करें, बुरे समय में निराश न हों और हर परिस्थिति में मानवता, संयम, सद्भाव तथा विनम्रता को बनाए रखें। यही जीवन को सार्थक और आनंदमय बनाने का सबसे सरल मार्ग है।






