लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: द्वंद्व मनुष्य जीवन का स्वाभाविक अंग है,जैसे कि दिन और रात। दोनों से मिलकर ही जीवन बनता है। उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
सुख-दुःख,मान-अपमान,लाभ-हानि,अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि के दो विरोधाभासी पक्षों से मिलकर ही यह जीवन बनता है और संसार का व्यापार चलता है।इसी पल ना जाने कितने लोग द्वंद्वजन्य अनुभवों से गुजर रहे होंगे - कुछ सुख व हर्ष की खुमारी में डूबे,आनंद के सागर में गोते लगाते हुए,तो कुछ दुःख व शोक के तमस में डूबे,कष्ट और पीड़ा के विकट पलों में तड़पते-कसमसाते हुए और यह सब सदैव भी नहीं रहता,इनकी उपस्थिति सामयिक ही रहती है। ये जीवन में कुछ ऐसे ही आते-जाते रहते हैं,जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन।दोनों से मिल कर ही जीवन की समग्र पटकथा तैयार होती है। सामान्यतया अनुकूल परिस्थितियों में तो सभी प्रफुल्ल दिखते हैं,लेकिन विषम परिस्थिति में घबरा जाते हैं,अपना संतुलन खो बैठते हैं और चिंता व तनाव से भर जाते हैं।इन परिस्थितियों के बीच मानसिक स्थिरता व संतुलन को बनाए रखना वस्तुतः साहस एवं सूझ की माँग करता है,जिसे हर व्यक्ति प्रारंभ में नहीं साध पाता।
दुःख,प्रतिकूलता एवं असफलता के अनवरत थपेड़ों के बीच व्यक्ति का निराश एवं हताश होना,आवासदरूपी मनोदशा से घिर जाना,आत्महत्या तक की बात सोचना आरंभ करने को सोचना स्वाभाविक है लेकिन इस मनोदशा में किसी तरह का समाधान नहीं निकलता,बल्कि व्यक्ति और गहरे अंधकार से घिर जाता है।इससे उबरना और विजयी होना ही एक सफल-सार्थक मानव जीवन की निशानी है और प्रकाश की किरण इन्हीं अंधकार के गहनतम पलों के मध्य ही कौंधती है,जो जीवन के गहनतम अंधकार को पल भर में दूर कर देती है।आशा,उत्साह से लबरेज और जीवट के धनी व्यक्ति के सामने निराशा का अंधकार अधिक देर तक नहीं ठहर पाता।इनका अस्तित्व सामयिक और क्षणिक ही रहता है।







