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बातचीत जारी, फिर भी युद्ध के लिए तैयार ईरान: क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के संकेत

विदेश डेस्क, आर्या कुमारी 

अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच सैन्य सतर्कता तेज, मध्य पूर्व में अस्थिरता बरकरार

ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि कूटनीतिक बातचीत जारी रहने के बावजूद देश के सशस्त्र बल पूरी तरह युद्ध के लिए तैयार हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के प्रयास जारी हैं।

अविश्वास और सैन्य तैयारी

गालिबाफ ने कहा कि ईरान अपने विरोधियों पर भरोसा नहीं कर सकता और किसी भी समय संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश की सेना ज़मीन पर पूरी तैयारी के साथ मौजूद है और किसी भी संभावित खतरे का सामना करने में सक्षम है। यह बयान क्षेत्र में बढ़ती असुरक्षा और अविश्वास को दर्शाता है।

वार्ता बनाम सुरक्षा रणनीति

ईरानी नेतृत्व का मानना है कि कूटनीतिक बातचीत का मतलब यह नहीं है कि सैन्य सतर्कता कम कर दी जाए। गालिबाफ ने इस धारणा को खारिज किया कि बातचीत के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा कमजोर हो सकती है। उनके अनुसार, “बातचीत और सुरक्षा तैयारी साथ-साथ चल सकती है।”

पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका

इस बीच पाकिस्तान के मीडिया के अनुसार, इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का दूसरा दौर जल्द होने की संभावना है। पाकिस्तान इस वार्ता में एक संभावित मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, जिससे क्षेत्रीय तनाव कम करने की उम्मीद जताई जा रही है।

हालिया सैन्य घटनाएं

28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान के ठिकानों पर किए गए हमलों में 3,000 से अधिक लोगों की मौत की खबर है। इसके बाद 8 अप्रैल को दोनों पक्षों ने अस्थायी युद्धविराम की घोषणा की थी, लेकिन यह स्थायी समाधान साबित नहीं हो सका।

बढ़ती टकराव की आशंका

हालांकि औपचारिक रूप से युद्ध फिर शुरू करने की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी शुरू करना स्थिति को और जटिल बना रहा है। इससे संकेत मिलता है कि तनाव अभी खत्म नहीं हुआ है और किसी भी समय टकराव बढ़ सकता है।

आगे की राह और वैश्विक प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वार्ता सफल नहीं होती, तो इसका असर पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है। तेल आपूर्ति, व्यापार मार्ग और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ने की आशंका है। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीति और सैन्य रणनीति के बीच संतुलन बेहद अहम होगा।