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मुस्लिम विरोधी सोच हिन्दुत्व नहीं : मोहन भागवत

नेशनल डेस्क, श्रेया पाण्डेय 

न्यूयॉर्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में हर इंसान की गरिमा और मानवीय एकता पर जोर देते हुए एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी व्यक्ति के धर्म के आधार पर उसके अस्तित्व को नकारना हिन्दुत्व की सोच नहीं हो सकती। भागवत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति मुसलमानों को भारत से बाहर निकालने की बात करता है, तो वह सच्चे अर्थों में हिन्दू नहीं हो सकता।

संघ प्रमुख ने यह बयान न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन परिसर स्थित इंफोसिस थिएटर में शनिवार, 29 अगस्त की रात आयोजित 'वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी' यानी 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' कार्यक्रम के दौरान दिया। यह आयोजन आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर किया गया था, जिसमें दुनिया भर के 30 से अधिक देशों से 200 से ज्यादा धर्मगुरु और प्रतिनिधि शामिल हुए। इस अंतर-धार्मिक मंच पर सभी प्रतिनिधियों ने नफरत, हिंसा और अविश्वास के खिलाफ एकजुटता दिखाते हुए वैश्विक शांति और आपसी भाईचारे को मजबूत करने का ऐतिहासिक संकल्प लिया।

भागवत ने अपने करीब 42 मिनट लंबे संबोधन में धर्म, पर्यावरण, मानवीय सोच, कर्तव्य और हिन्दुत्व सहित कई विषयों पर विस्तार से अपनी बात रखी। इस दौरान उन्होंने एक पुराने संवाद का जिक्र किया, जिसमें मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने उनसे सवाल पूछा था कि चूंकि आरएसएस एक हिन्दू संगठन है और हिन्दू राष्ट्र की बात करता है, तो ऐसे में मुसलमानों का क्या होगा। क्या उन्हें भारत से बाहर कर दिया जाएगा। इस सवाल का जवाब देते हुए भागवत ने कहा, "मैंने उन्हें जवाब दिया था कि ऐसा करना हिन्दुत्व नहीं है। अगर कोई हिन्दू यह सोचता है कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए, तो वह हिन्दू नहीं है।"

संघ प्रमुख ने इस मौके पर हिन्दुत्व की अपनी व्याख्या भी प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि हिन्दुत्व किसी समुदाय को बाहर करने या नकारने की सोच से पूरी तरह अलग है। उनके अनुसार हिन्दू विचारधारा में सत्य तक पहुंचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं, लेकिन सभी का अंतिम लक्ष्य एक ही होता है। उन्होंने 'विविधता में एकता' को भारत की मूल पहचान बताते हुए कहा कि अलग-अलग समुदायों के साथ सह-अस्तित्व ही भारतीय संस्कृति की बुनियाद है।

अपने संबोधन में भागवत ने अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से भी अपील की कि वे अपनी कर्मभूमि के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहें। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्मों और विचारों के बावजूद मानवता मूल रूप से एक है, और यह संदेश उन्होंने भारत तथा अमेरिका दोनों के संदर्भ में साझा किया।

भागवत के इस बयान की देश-विदेश में व्यापक चर्चा हो रही है। हालांकि इस कार्यक्रम को लेकर कुछ विरोधी स्वरों ने भी प्रतिक्रिया दी है, जिन्होंने इसे एक राजनीतिक रूप से प्रेरित आयोजन बताया। बहरहाल, संघ प्रमुख के इस बयान को धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक समरसता के संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जो वैश्विक मंच से भारत की बहुलतावादी छवि को रेखांकित करता है। यह कार्यक्रम वैश्विक शांति पहल के तहत आयोजित किया गया था और इसमें आरएसएस ने पूर्ण समर्थन देने की बात कही।