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साकेत गोखले बनाम लक्ष्मी पुरी मानहानि मामला: कोर्ट का बड़ा फैसला, माफीनामा और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी पर सवाल

नीतीश कुमार |
टीएमसी राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने पूर्व भारतीय राजदूत लक्ष्मी पुरी से 10 जून 2025 को सुबह 3 बजकर 28 मिनट पर एक्स पर बिना शर्त माफी माँगी है। यह माफी दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद आई है, जिसमें गोखले को झूठा और मानहानिकारक पाया था। कोर्ट ने साकेत गोखले पर ₹50 लाख का जुर्माना भी लगाया था। आज साकेत गोखले और लक्ष्मी पुरी के बीच का मानहानि मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक चर्चा का विषय बना हुआ है। यह मामला 2021 में शुरू हुआ, जब गोखले, जो तृणमूल कांग्रेस के सांसद हैं, ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर कुछ ट्वीट्स किए, जिसमें उन्होंने पुरी पर स्विट्जरलैंड में संपत्ति खरीदने का आरोप लगाया, जो उनकी आय के अनुपात में नहीं थी। इन ट्वीट्स में उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को भी टैग किया और प्रवर्तन निदेशालय की जांच की मांग की। लक्ष्मी पुरी, जो पूर्व संयुक्त राष्ट्र सहायक महासचिव हैं और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की पत्नी हैं, ने इन ट्वीट्स को मानहानिकारक मानते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 1 जुलाई 2024 को अपने फैसले में गोखले के ट्वीट्स को "गलत, दुर्भावनापूर्ण, और अपुष्ट" करार दिया, और कहा कि ये ट्वीट सोशल मीडिया पर एक श्रृंखला प्रतिक्रिया पैदा करने वाले थे, जिसने पुरी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया। कोर्ट ने गोखले को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने और माफीनामा प्रकाशित करने का आदेश दिया, जिसमें माफीनामा को उनके एक्स हैंडल पर 6 महीने तक अपनी प्रोफाइल पर पिन करना और एक राष्ट्राय अख़बार में प्रकाशित करना शामिल था। 10 जून (मंगलवार) 2025 को साकेत गोखले ने कोर्ट के आदेश के तहत सार्वजनिक माफीनामा एक्स पर पोस्ट किया। 


साकेत गोखले ने एक्स पर लिखा-
" बिना किसी शर्त के माफी माँगता हूँ कि मैंने 13 जून और 23 जून 2021 को राजदूत लक्ष्मी मुर्देश्वर पुरी के खिलाफ कुछ ट्वीट्स किए थे। इन ट्वीट्स में उनके द्वारा विदेश में संपत्ति खरीदने को लेकर ग़लत और बिना पुष्टि के आरोप लगाए गए थे, जिन्हें लेकर मैं गहराई से खेद प्रकट करता हूँ।"

कानूनी संदर्भ
यह मामला भारत में सोशल मीडिया से संबंधित मानहानि के बढ़ते रुझान को दर्शाता है। पुणे साइबर पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2021 के बीच सोशल मीडिया से संबंधित अपराधों में 100% की वृद्धि हुई, जिसमें 4,357 मामले दर्ज किए गए। इनमें फर्जी प्रोफाइल बनाने, मानहानिकारक पोस्ट करने, अश्लील टिप्पणियां करने और पहचान चोरी जैसे अपराध शामिल थे। यह वृद्धि सोशल मीडिया की पहुंच और इसके दुरुपयोग की बढ़ती चुनौतियों को दर्शाती है।
कानूनी दृष्टिकोण से, इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 499, जो मानहानि को परिभाषित करती है, लागू हुई। कोर्ट ने गोखले के ट्वीट्स को "प्रथम दृष्टया मानहानिकारक" माना, और कहा कि ये ट्वीट बिना किसी सत्यापन के किए गए थे, जो पुरी की प्रतिष्ठा को कानूनी चोट पहुंचाने वाले थे। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि गोखले ने मामले में कोई पछतावा नहीं दिखाया, और उनकी गैर-हाजिरी ने मामले को और गंभीर बना दिया।
इसके अलावा, 2021 में ही कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी किया था, जिसमें गोखले को अपने ट्वीट्स हटाने और भविष्य में ऐसे मानहानिकारक पोस्ट करने से रोकने का निर्देश दिया गया था। यह दिखाता है कि कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और तुरंत कार्रवाई की।


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम जिम्मेदारी
यह मामला स्वतंत्र भाषण और जिम्मेदारी के बीच संतुलन की चुनौती को उजागर करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत स्वतंत्र भाषण और अभिव्यक्ति का अधिकार दिया गया है, लेकिन यह उचित प्रतिबंधों के अधीन है, जिसमें दूसरों की प्रतिष्ठा की रक्षा भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में, जैसे Subramanian Swamy v. Union of India, यह स्पष्ट किया है कि आपराधिक मानहानि स्वतंत्र भाषण के अधिकार के खिलाफ नहीं है, और प्रतिष्ठा की रक्षा एक मौलिक अधिकार है।
गोखले के मामले में, कोर्ट ने कहा कि उनके ट्वीट्स बिना किसी सत्यापन के किए गए थे, और ये दुर्भावनापूर्ण थे, जो स्वतंत्र भाषण के दुरुपयोग का उदाहरण है। यह मामला यह याद दिलाता है कि सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं, विशेष रूप से सार्वजनिक हस्तियों, को अपने पोस्ट के प्रभाव के बारे में सावधान रहना चाहिए। तथ्यों की जांच और सत्यापन एक नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है।


सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के लिए सबक
यह मामला सभी सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के लिए एक चेतावनी है — खासकर कार्यकर्ता, पत्रकार और प्रभावशाली लोग। इंटरनेट एक सार्वजनिक मंच है, और उस पर कही गई हर बात के कानूनी परिणाम हो सकते हैं। भले ही कोई "सत्य उजागर" करने के उद्देश्य से कुछ पोस्ट करे, तथ्यों की पुष्टि और निष्पक्षता की ज़िम्मेदारी उस पर बनी रहती है।
साकेत गोखले अक्सर सत्ता और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में खुद मानहानि के आरोपों में फँसना किसी विडंबना से कम नहीं। यह मामला एक सरल लेकिन ज़रूरी सीख देता है — "ट्वीट करने से पहले सोचें, क्योंकि शब्द तीर की तरह होते हैं, एक बार छूट गए तो वापस नहीं आते।"
हालाँकि कोर्ट का फैसला न्यायिक दृष्टि से मजबूत है, लेकिन यह भी स्पष्ट करता है कि मौजूदा कानून सोशल मीडिया पर गलत सूचना के प्रसार को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी, डिजिटल साक्षरता और नई तकनीकी नीतियों की ज़रूरत है।
साथ ही, यह मामला सामाजिक असमानता को भी दिखाता है, जहां सार्वजनिक हस्तियों के पास कानूनी लड़ाई लड़ने के संसाधन होते हैं, वहीं आम नागरिक अक्सर ऑनलाइन मानहानि या ट्रोलिंग के खिलाफ कुछ नहीं कर पाते।