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अमेरिकी और ईरान के बीच प्रारंभिक समझौता, 60 दिन का सीजफायर लागू || अमेरिकी सेंट्रल कमान की घोषणा, ईरान की नाकेबंदी समाप्त || ईरान - अमेरिका में टकराव चरम पर, नए हमलों से सीजफायर पर लग सकता ब्रेक || जापान: तूफान जोंगमी ने मचाई तबाही, 60 हजार से अधिक घरों में बिजली गुल || जयराम रमेश ने लिखा पत्र, ग्रेट निकोबार परियोजना पर पुनर्विचार की अपील || नई दिल्ली के मालवीय नगर स्थित रेस्टोरेंट में आग से 20 की मौत, दर्जनों घायल || ट्रंप ने कहा, खाड़ी देशों की अपील पर ईरान पर हमले बंद किए गए || अदाणी समूह को अमेरिका से क्लीनचिट, आपराधिक मामलों में राहत || राहुल गांधी ने कहा, देश में बड़ा आर्थिक संकट आने वाला, आम आदमी होगा परेशान || भारत और नार्वे के बीच कुल 9 समझौतों पर हस्ताक्षर, बेहतर सहयोग की पहल: मोदी

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होर्मुज शुल्क पर ट्रंप को ईरान का जवाब, कहा- 20% बहुत ज्यादा

विदेश डेस्क, आर्या कुमारी।

तेहरान। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सभी कार्गो जहाजों पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रस्ताव पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने इस प्रस्ताव को अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि अमेरिका नहीं, बल्कि ईरान लंबे समय से इस रणनीतिक समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करता आया है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने ट्रंप के बयान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि सुरक्षा के बदले शुल्क लेने की बात है तो उसका वास्तविक अधिकार उसी देश को है, जिसने वर्षों से इस जलमार्ग की रक्षा की है।

अराघची ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी अपने बयान में कहा कि ट्रंप की यह बात सही है कि जो पक्ष जहाजों को सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराता है, उसे उसके बदले भुगतान मिलना चाहिए। हालांकि उन्होंने ट्रंप द्वारा प्रस्तावित 20 प्रतिशत शुल्क को अत्यधिक बताते हुए कहा कि इतनी अधिक फीस उचित नहीं है। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि यदि शुल्क लिया जाएगा तो ईरान "उचित" शुल्क ही वसूलेगा। उनके इस बयान को ट्रंप की नई समुद्री नीति पर सीधा जवाब माना जा रहा है।

दरअसल, ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर घोषणा की थी कि अमेरिका अब स्वयं को "होर्मुज जलडमरूमध्य का रक्षक" मानेगा। उन्होंने कहा कि दुनिया के इस संवेदनशील समुद्री क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के बदले यहां से गुजरने वाले सभी वाणिज्यिक कार्गो जहाजों पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। ट्रंप के अनुसार यह व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खुला रहेगा, लेकिन यह कदम विशेष रूप से ईरान पर दबाव बढ़ाने और उसके खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की रणनीति का हिस्सा है।

इसी बीच अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने घोषणा की है कि 14 जुलाई की शाम से ईरानी बंदरगाहों पर आने-जाने वाले समुद्री यातायात पर फिर से नाकेबंदी लागू की जाएगी। अमेरिकी सेना ने कहा कि ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों की ओर जाने वाले अथवा वहां से लौटने वाले जहाजों की निगरानी की जाएगी और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। साथ ही खाड़ी क्षेत्र और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास मौजूद सभी जहाजों और नाविकों को समुद्री प्रसारण पर नजर बनाए रखने तथा रेडियो चैनल-16 के जरिए अमेरिकी नौसेना के संपर्क में रहने की सलाह दी गई है। इससे पहले अप्रैल से जून के बीच भी ऐसी नाकेबंदी लागू की गई थी, जिसे अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते के बाद अस्थायी रूप से हटा लिया गया था।

अमेरिका और ईरान के बीच यह बयानबाजी ऐसे समय में तेज हुई है जब दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है। हाल के दिनों में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर नए सैन्य हमलों के आरोप लगाए हैं। इसी के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर दोनों देशों के दावे भी और अधिक आक्रामक हो गए हैं। ईरान का कहना है कि पिछले महीने हुए अंतरिम शांति समझौते के तहत उसे इस जलमार्ग से गुजरने वाले समुद्री यातायात को नियंत्रित करने और आवश्यक शुल्क लेने का अधिकार प्राप्त है, जबकि अमेरिका इस दावे को अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के विपरीत बता रहा है।

अमेरिका का तर्क है कि किसी भी द्विपक्षीय समझौते से अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर सभी देशों के स्वतंत्र आवागमन का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता। ट्रंप ने हाल ही में यह भी कहा था कि पर्दे के पीछे जारी वार्ताओं के बावजूद अंतरिम समझौता अब प्रभावी नहीं रह गया है। इसके बाद दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा और नियंत्रण को लेकर तनाव और अधिक बढ़ गया है, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका भी गहरा गई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की बड़ी मात्रा इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचती है। अनुमान है कि दुनिया के कुल तेल और एलएनजी व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या नाकेबंदी पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। फरवरी में तेहरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद शुरू हुआ विवाद अब समुद्री नियंत्रण और सुरक्षा के मुद्दे तक पहुंच चुका है, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बना हुआ है।