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स्वयं की कमियों को पहचानने वाली दृष्टि ही सबसे श्रेष्ठ होती है: बिमल सर्राफ

लोकल डेस्क, ऋषि राज |

रक्सौल: "जिंदगी के बैंक में जब प्रेम का संतुलन कम हो जाता है, तब सुख के चेक भी अस्वीकृत होने लगते हैं।" यह प्रेरणादायी विचार लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई के जोनल चेयरपर्सन, डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन, समाजसेवी तथा भारत विकास परिषद्, रक्सौल के सेवा संयोजक एवं मीडिया प्रभारी बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किए।

उन्होंने कहा कि जो लोग समय के साथ बदल जाते हैं, उनके लिए अधिक दुःखी होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पत्ते जब भी अपना रंग बदलते हैं, अंततः जमीन पर ही आ गिरते हैं। बिना प्रयास के मनुष्य केवल नीचे गिर सकता है, ऊपर नहीं उठ सकता। यह केवल गुरुत्वाकर्षण का ही नहीं, बल्कि जीवन का भी अटल नियम है।

श्री सर्राफ ने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी उसके श्रेष्ठ विचार हैं। धन और शक्ति व्यक्ति को गलत मार्ग पर ले जा सकते हैं, लेकिन अच्छे विचार सदैव अच्छे कर्मों की प्रेरणा देते हैं। सबसे श्रेष्ठ दृष्टि वही है, जो दूसरों की नहीं, बल्कि अपनी कमियों को पहचान सके। नींद तो प्रतिदिन खुलती है, किंतु आत्मबोध की आंखें कभी-कभी ही खुलती हैं।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने अतीत से सीख लेते हुए आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि वही उसका सबसे बड़ा मार्गदर्शक होता है। वर्तमान समय में अत्यंत सावधानी से चलने की आवश्यकता है, क्योंकि इस बदलती दुनिया में लोगों को पलकों पर भी बैठाया जाता है और अवसर मिलते ही नजरों से भी गिरा दिया जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि दुःख हमेशा पीछे की ओर देखता है, चिंता चारों ओर भटकाती है, जबकि विश्वास ही वह शक्ति है जो सदैव भविष्य की ओर देखने की प्रेरणा देता है। इसलिए विश्वास की ज्योति कभी बुझने नहीं देनी चाहिए। जब तक हम एक-दूसरे की सहायता करते रहेंगे, तब तक न व्यापार, न परिवार और न ही समाज—कोई भी कमजोर नहीं पड़ेगा।

श्री सर्राफ ने कहा कि कौन सही है और कौन गलत, इस पर समय व्यर्थ करने के बजाय व्यक्ति को अपनी उन्नति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यदि हम स्वयं सही मार्ग पर चलेंगे और निरंतर प्रगति करेंगे, तो हमारी सफलता दूसरों की उन्नति का भी मार्ग प्रशस्त करेगी।

उन्होंने कहा कि परमात्मा की कृपा उसी व्यक्ति पर होती है, जो प्रत्येक कार्य में सच्चे मन से उनका स्मरण और मार्गदर्शन चाहता है। जिस प्रकार किसी वृक्ष की सुंदरता उसके फूलों और पत्तों से बढ़ती है, उसी प्रकार मनुष्य की वास्तविक सुंदरता उसके विचार, व्यवहार और संस्कार से प्रकट होती है।

अंत में उन्होंने कहा कि जीवन में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है—स्वयं को पहचानना, अपनी कमियों को स्वीकार करना और निरंतर आत्मसुधार की दिशा में आगे बढ़ते रहना।