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LAC पर चीन ने घटाई सैनिकों की तैनाती, भारत की दूसरी शर्त मानी

नेशनल डेस्क, आर्या कुमारी।

नई दिल्ली। चीन ने भारत से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अपनी चीनी सेना की तैनाती में कमी की है। रक्षा मंत्रालय की ताजा सालाना रिपोर्ट में वर्ष 2025 के दौरान उत्तरी सीमा के सामने चीनी सैनिकों की संख्या में उल्लेखनीय कमी का जिक्र किया गया है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने आए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद दोनों देशों के संबंधों में सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच सीमा पर चीनी सेना की तैनाती कम होने को भी दोनों देशों के बीच तनाव घटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय की 2025-26 की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल उत्तरी सीमाओं के सामने चीनी सेना की तैनाती में उल्लेखनीय कमी आई। रिपोर्ट में बताया गया है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा से सटे चीन के क्षेत्रों और उसके पारंपरिक प्रशिक्षण क्षेत्रों में चीनी सेना की 10-10 संयुक्त हथियार ब्रिगेड तैनात हैं। इस रिपोर्ट को हाल ही में रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के सभी क्षेत्रों, यानी पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक, भारतीय सेना की तैनाती बेहद मजबूत और अच्छी स्थिति में है और वह किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।

इस स्थिति से यह संकेत मिलता है कि वर्ष 2024 में सैनिकों को पीछे हटाने की प्रक्रिया के बाद चीन ने भारतीय सेना की तनाव कम करने से जुड़ी दूसरी शर्त को भी मान लिया है। तनाव कम करने का मतलब सीमा पर सैनिकों की संख्या में कमी करना है। हालांकि, अभी तीसरी शर्त यानी सैनिकों को पूरी तरह पीछे हटाना बाकी है। इसके तहत सैनिकों को सीमा से हटाकर वापस उनकी बैरक में भेजना होता है। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही वर्ष 2020 में गलवान घाटी की झड़प से पहले जैसी स्थिति वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कायम हो सकेगी और दोनों देशों की सेनाओं के बीच संबंधों को पूरी तरह सामान्य माना जा सकेगा। दूसरी ओर, अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबानसिरी इलाके में पिछले करीब एक महीने से दोनों देशों की सेनाओं के बीच आमना-सामना जारी है। इस गतिरोध को खत्म करने के लिए कोर कमांडर स्तर की दो बैठकें भी हो चुकी हैं, लेकिन इसके बावजूद तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

चीन की एक संयुक्त हथियार ब्रिगेड को भारतीय सेना की एक डिवीजन के बराबर माना जाता है, जिसमें करीब 14 से 15 हजार सैनिक हो सकते हैं। इस हिसाब से अगर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की 10 संयुक्त हथियार ब्रिगेड तैनात हैं, तो वहां करीब डेढ़ लाख चीनी सैनिकों की मौजूदगी मानी जा सकती है। इन ब्रिगेड में केवल पैदल सेना की बटालियन ही नहीं होतीं, बल्कि बख्तरबंद गाड़ियां, तोपखाना, वायु रक्षा प्रणाली और ड्रोन युद्ध से जुड़ी इकाइयां भी शामिल होती हैं। गलवान घाटी की झड़प के दौरान अकेले पूर्वी लद्दाख में चीन ने करीब एक लाख सैनिक तैनात किए थे। ऐसे में पिछले छह वर्षों में 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सेना की तैनाती में बड़ी कमी आई है।

हालांकि, रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनाती कम होने के बावजूद चीन ने भारतीय सीमा के करीब अपने प्रशिक्षण क्षेत्रों में भी करीब डेढ़ लाख सैनिकों की तैनाती कर रखी है। सीमा के नजदीक प्रशिक्षण क्षेत्रों में सैनिकों की मौजूदगी का मतलब है कि जरूरत पड़ने पर उन्हें कम समय में वास्तविक नियंत्रण रेखा की ओर भेजा जा सकता है। यही वजह है कि भारतीय सेना चीन से सैनिकों को पूरी तरह पीछे हटाने पर जोर दे रही है। भारत चाहता है कि सैनिकों को सीमा से दूर उनकी बैरक में वापस भेजा जाए। तभी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थिति को वास्तव में सामान्य माना जा सकेगा और सीमा पर सैन्य तनाव में स्थायी कमी की उम्मीद की जा सकती है।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से अलग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक भी हुई थी। बैठक में दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि आपसी मतभेदों को विवाद में नहीं बदलना चाहिए। साथ ही यह भी माना गया कि भारत-चीन के संबंध सम्मान, संवेदनशीलता और हित के तीन पारस्परिक सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए। भारत आने से पहले शी जिनपिंग ने चीन की शीर्ष सैन्य संस्था केंद्रीय सैन्य आयोग में नंबर दो माने जाने वाले जनरल झांग योक्सिया को पद से हटा दिया था। उनकी बर्खास्तगी को चीन की सेना में भ्रष्टाचार से जोड़कर देखा गया था। हालांकि, जून 2020 में गलवान घाटी की झड़प के समय झांग पश्चिमी थिएटर कमांड के प्रमुख थे, जो भारतीय सीमा से जुड़े क्षेत्र में तैनात रहती है। वर्ष 2017 के डोकलाम विवाद के लिए भी उन्हें जिम्मेदार माना गया था। ऐसे में यह संकेत मिल रहे हैं कि चीन भारत के साथ आर्थिक संबंध सुधारने के साथ-साथ सीमा पर भी स्थिति को सामान्य करने की कोशिश कर रहा है। भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सीमा की स्थिति का असर दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेगा।

रक्षा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और चीन के बीच राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर लगातार हो रहे संपर्क का सकारात्मक असर उत्तरी सीमा यानी भारत-चीन सीमा की स्थिति पर पड़ा है। रिपोर्ट में परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र तथा भारत-चीन सीमा मामले के लिए विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता का भी उल्लेख किया गया है। इन प्रयासों से सीमा पर स्थिरता बढ़ने की बात कही गई है। इसके अलावा शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के तियानजिन यात्रा का भी रिपोर्ट में जिक्र है, जिसे सीमा पर शांति स्थापित करने की दिशा में अहम माना गया है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, दोनों देशों के बीच कोर कमांडर स्तर की वार्ता और चीनी सेना के साथ सीमा कर्मियों की बैठक के जरिए भी वास्तविक नियंत्रण रेखा के सभी क्षेत्रों में विवादित मुद्दों को सौहार्दपूर्ण और दोस्ताना माहौल में सुलझाने की कोशिश की जा रही है।