लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: मनुष्य जितना अपने जीवन से नहीं, उससे कहीं अधिक दूसरों से अपेक्षाएँ रखकर दुखी होता है। जीवन में दुख का सबसे बड़ा कारण परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों से जुड़ी हमारी अपेक्षाएँ होती हैं।
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि लोग हमारे अनुसार व्यवहार करें, हमारे मन की बात समझें, हमें सम्मान दें और हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा हम चाहते हैं। लेकिन संसार हमारी इच्छाओं के अनुसार नहीं चलता। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सोच, अपनी परिस्थितियाँ और अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं। जब हमारी अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तब मन में निराशा, शिकायत और दुख जन्म लेने लगता है।
सर्राफ ने कहा कि जीवन को सरल और आनंदमय बनाना है तो अपेक्षाओं को कम और स्वीकार करने की क्षमता को अधिक करना होगा। किसी से प्रेम करना अच्छी बात है, लेकिन प्रेम के बदले हमेशा वैसा ही प्रेम मिले, इसकी अपेक्षा करना ही दुख का कारण बन जाता है। किसी की सहायता करना पुण्य है, लेकिन बदले में प्रशंसा या सहायता की उम्मीद करना उस पुण्य को भी अपेक्षा के बोझ में बदल देता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह अपने सुख की चाबी दूसरों के हाथों में सौंप देता है। कोई हमारी प्रशंसा करे तो हम प्रसन्न हो जाते हैं और कोई आलोचना कर दे तो हमारा मन दुखी हो जाता है। कोई हमारे साथ खड़ा रहे तो हम उसे अपना मानते हैं और उसके दूर होते ही स्वयं को अकेला समझने लगते हैं। वास्तव में हमारा मन जितना दूसरों के व्यवहार से प्रभावित होता है, उतना ही हम अपनी आंतरिक शांति से दूर होते जाते हैं।
बिमल सर्राफ ने कहा कि जीवन में हर व्यक्ति हमारी इच्छा के अनुसार नहीं चलेगा और हर संबंध हमारी अपेक्षाओं के अनुसार नहीं टिकेगा। कुछ लोग साथ चलेंगे, कुछ रास्ते में छूट जाएंगे और कुछ केवल हमें कोई सीख देने के लिए जीवन में आएंगे। इसलिए हर रिश्ते को पकड़कर रखना आवश्यक नहीं है। जो हमारे साथ है, उसके साथ प्रेम से रहें और जो दूर हो गया है, उसे सहजता से स्वीकार करना सीखें।
उन्होंने कहा कि अपेक्षाओं से मुक्त होने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने कर्तव्यों को छोड़ दे। इसका अर्थ केवल इतना है कि हम अपना कर्म पूरी ईमानदारी से करें, लेकिन उसके परिणाम को अपने मन की शर्तों से न बांधें। जब कर्म में निष्ठा और परिणाम में सहजता आ जाती है, तब मनुष्य के भीतर एक अलग प्रकार की शांति जन्म लेती है।
उन्होंने कहा कि प्रकृति हमें प्रतिदिन यही सिखाती है। वृक्ष फल देता है, नदी जल देती है और सूर्य प्रकाश देता है, लेकिन वे बदले में कुछ मांगते नहीं। जीवन की सुंदरता भी तभी बढ़ती है जब हमारा देना अपेक्षा से नहीं, प्रेम और कर्तव्य से जुड़ा हो।
सर्राफ ने कहा कि मन को शांत रखना है तो दूसरों को बदलने की कोशिश करने के बजाय स्वयं को बदलना होगा। परिस्थितियाँ हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन परिस्थितियों के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमारे हाथ में होता है। जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है कि हर व्यक्ति को अपने तरीके से जीने का अधिकार है, उसी दिन उसके भीतर शिकायत कम और संतोष अधिक होने लगता है।
उन्होंने कहा कि जीवन बहुत छोटा है। इसे शिकायतों, तुलना और अधूरी अपेक्षाओं में समाप्त करने के बजाय जो मिला है, उसका सम्मान करें, जो साथ है उसका प्रेम से स्वागत करें और जो नहीं मिला, उसके लिए स्वयं को दुखी न करें। अपेक्षाएँ कम होंगी तो शिकायतें कम होंगी, शिकायतें कम होंगी तो मन शांत होगा और मन शांत होगा तो जीवन अपने आप आनंदमय हो जाएगा।







