लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: आत्मसंयम ही स्वर्ग का द्वार है।व्यक्ति हो या परिवार अथवा समाज,संयम ही सुख एवं शांति का आधार है।जीवन में सुख-चैन के अभाव का मुख्य कारण असंयम ही है।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
समाज में फैली हिंसा,अपराध,बलात्कार,रोग,शोक एवं दुःख का मूल कारण आत्मसंयम की कमी है। वस्तुतः आत्मसंयम पुण्यार्जन की मात्रा की पहली सीढ़ी है और इस यात्रा में इंद्रियसंयम सर्वप्रथम आता है,जिसकी प्रायः धज्जियाँ उड़ती रहती हैं।इसका प्रमुख कारण रहता है, प्रलोभन का मोहक एवं मायावी आकर्षण,जो पहले व्यक्ति को लुभाता है,आकर्षित करता है,फिर अपनाने पर नागपाश बनकर जकड़ लेता है और पूरा सारतत्व निचोड़कर ही दम लेता है।सुख की खोज में भटक रहे इंद्रियलोलुप लोग एवं नैतिक दृष्टि से कमजोर चरित्र वाले व्यक्ति जहाँ आसानी से प्रलोभन के शिकार हो जाते हैं तो वहीं साधकों को भी प्रारंभिक अवस्था में दीर्घकाल तक प्रलोभनों की चुनौती का सामना करना पड़ता है। यहाँ तक कि सात्त्विक बुद्धि वाले तक दूषित वातावरण के प्रभाव में प्रलोभनों के शिकंजे में कसते देखे जा सकते हैं।जैसे,युद्ध में प्रतिपक्षी की चाल पर पैनी निगाह रखी जाती है,वैसे ही मनरूपी चंचल शत्रु पर तीव्र दृष्टि रखनी पड़ती है और विवेक को सदा जागृत रखना होता है। निःसंदेह हमारा अनगढ़ मन हमारा बड़ा बलवान शत्रु है।वासना और कुविचार की माया इस पर बड़ी शीघ्रता से हावी होती है एवं बड़े बड़े संयमी ऐसे में स्वयं पर काबू खो बैठते हैं और पथभ्रष्ट होते रहते हैं।







