लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: इच्छारहित मृत्यु-जन्म मरण के चक्र से मुक्त कर देती है।इच्छा का समाप्त हो जाना ही मोक्ष है,बंधन से मुक्ति है।
उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया। जिस इच्छा का ईश्वर से मिलना हो जाता,उनका पुनर्जन्म नहीं होता है।इसमें गहरा तत्वज्ञान है।यह गहनतम तर्क है,अंतर्दृष्टि है। दुःख का घर है पुनर्जन्म।पुनर्जन्म का प्रारंभ जीवन की आकांक्षा है, जीवेष्णा है कि और मैं जीता ही चला जाऊं।एक इच्छा पूरी नहीं होती कि वह दस इच्छाओं को जन्म दे जाती है और किसी भी इच्छा को पूरा करना हो तो जीवन चाहिए,समय चाहिए अन्यथा इच्छा पूरी नहीं होगी।इच्छा के लिए भविष्य चाहिए।अगर भविष्य न हो तो इच्छा क्या करेगी,अगर मैं इसी क्षण मर जाने वाला हूँ तो इच्छा करना व्यर्थ हो जाएगा ; क्योंकि इच्छा के लिए जरूरी है कि कल हो,आने वाला दिन हो।आने वाला दिन हो तो ही इच्छा को फैलाया जा सकता है और इसके लिए श्रम किया जा सकता है।इच्छा पूरी हो सके तो उसको पूरा करने के लिए समय की जरूरत है।
अगर इच्छा पूरी करनी है तो समय के बिना पूरी नहीं हो सकती।इसके लिए समय चाहिए और अगर हर इच्छा दस इच्छाओं को जन्म दे जाती हो तो हर इच्छा के बाद दस गुना समय चाहिए।हर जीवन के बाद हम दस और नई इच्छाएँ पैदा कर लेते हैं।सत्य ये है कि पूरे जीवन हम इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश करते हैं और आखिर में हम पाते हैं कि कोई इच्छा पूरी ही नहीं हुई,मरते क्षण हम और भी इच्छाओं को जिंदा कर लेते हैं।तब मरते क्षण में एक और जन्म की आकांक्षा पैदा होती है ; क्योंकि इच्छा है तो एक जीवन और चाहिए और जीवन को पाने की इच्छा पुनर्जन्म बन जाती है।पुनर्जन्म का सूत्र या दुःख का आधार इच्छा है,तृष्णा है।अगर हमें कोई भी इच्छा नहीं है तो हम कहेंगे कि आने वाला कल की मुझे अब जरूरत नहीं रही।इच्छा नहीं होगी,समय नहीं होगा तो वहाँ पुनर्जन्म नहीं होगा।







