एंटरटेनमेंट डेस्क, अर्पिता कृष्णा
गीतकार और पटकथा लेखक प्रसून जोशी ने मनोरंजन जगत में लगातार बढ़ रहे कंटेंट और दर्शकों की देखने की आदतों पर अपनी राय साझा की है। हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने मौजूदा स्थिति को ‘कंटेंट इंडाइजेशन’ बताया। उनके अनुसार, आज दर्शकों के पास मनोरंजन के इतने अधिक विकल्प हैं कि लगातार कंटेंट देखने के कारण नई कहानियों के प्रति उनकी उत्सुकता प्रभावित हो सकती है।
प्रसून जोशी ने कहा कि पहले दर्शक नई फिल्मों का इंतजार करते थे और सिनेमाघरों में जाकर उन्हें देखने का उत्साह रखते थे। लेकिन अब डिजिटल मंचों, फिल्मों, वेब सीरीज और सोशल मीडिया के कारण दर्शकों के पास हर समय मनोरंजन के कई विकल्प उपलब्ध हैं। उनके मुताबिक, कंटेंट की इस अधिकता ने दर्शकों के देखने के अनुभव को बदल दिया है।
इस स्थिति को समझाने के लिए प्रसून जोशी ने खाने का उदाहरण दिया। उन्होंने कंटेंट की लगातार खपत की तुलना दिनभर कुछ न कुछ खाते रहने से की। जिस तरह लगातार खाते रहने से भूख का एहसास कम हो सकता है, उसी तरह लगातार कंटेंट देखने से दर्शकों की नई कहानियां देखने की उत्सुकता भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, यह दर्शकों के व्यवहार को लेकर उनका विचार है, न कि किसी अध्ययन का निष्कर्ष।
प्रसून जोशी ने फिल्म निर्माताओं की रचनात्मक सोच पर भी चर्चा की। उन्होंने पहले से सफल रहे फॉर्मूलों को बार-बार दोहराने के बजाय मौलिक कहानियों और नए विचारों को महत्व देने की बात कही। उनके अनुसार, केवल किसी सफल फिल्म के तरीके को अपनाना दर्शकों से जुड़ने की गारंटी नहीं देता।
उन्होंने कहानियों में प्रामाणिकता और रचनात्मकता के महत्व पर जोर दिया। उनके विचार में, हर रचनाकार का अपना अनुभव और कहानी कहने का अलग तरीका होता है। इसलिए फिल्म निर्माताओं को केवल मौजूदा चलन के अनुसार कंटेंट तैयार करने के बजाय अपनी मौलिक सोच पर भी ध्यान देना चाहिए।
डिजिटल मंचों और सोशल मीडिया के विस्तार ने मनोरंजन देखने के तरीकों में बदलाव किया है। दर्शक अब अपनी पसंद और सुविधा के अनुसार अलग-अलग माध्यमों पर कंटेंट देख सकते हैं। प्रसून जोशी की टिप्पणी इसी बदलते माहौल में दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने और उनसे जुड़ने वाली कहानियां बनाने की चुनौती को सामने रखती है।
प्रसून जोशी के इस बयान का मुख्य संदेश यह है कि मनोरंजन जगत में केवल कंटेंट की मात्रा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। दर्शकों के साथ जुड़ाव बनाने के लिए नई, मौलिक और प्रामाणिक कहानियां प्रस्तुत करना भी जरूरी है।






