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चकाचौंध में खोता समाज, टूटते और बिखरते रिश्ते: बिमल सर्राफ |

लोकल डेस्क, आकाश अस्थाना।

रक्सौल: आज का समाज तेजी से बदल रहा है। आधुनिकता, दिखावे और चकाचौंध की दौड़ में इंसान इतना आगे निकल गया है कि उसे अपने रिश्तों, परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों की भी चिंता कम होती जा रही है। युवा पीढ़ी वास्तविकता से दूर होकर आभासी दुनिया और बाहरी आकर्षण को ही जीवन की सफलता समझने लगी है।

कभी परिवार प्रेम, विश्वास, त्याग और आपसी समझदारी की पहचान हुआ करते थे। घर के बड़े-बुजुर्गों का सम्मान होता था और छोटे-बड़े सभी एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे। लेकिन आज स्वार्थ, अहंकार और अपनी इच्छाओं को सर्वोपरि रखने की सोच ने पारिवारिक एकता को कमजोर कर दिया है। एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग भी भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।

उक्त विश्लेषण लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने व्यक्त किया।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि इंसान दूसरों से आगे निकलने की होड़ में अपने भीतर की संवेदनाओं को खोता जा रहा है। सोशल मीडिया की चमक, महंगे साधनों और दिखावे को प्रतिष्ठा का पैमाना मान लिया गया है, जबकि सच्ची खुशी प्रेम, संतोष और आत्मीयता में छिपी होती है।

आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं? यदि परिवारों में संवाद खत्म हो जाएगा, रिश्तों में विश्वास नहीं रहेगा और समाज में केवल स्वार्थ ही रह जाएगा, तो आने वाली पीढ़ी को संस्कार, सहयोग और अपनापन कौन सिखाएगा?

समय की मांग है कि हम आधुनिकता को अपनाएं, लेकिन अपनी संस्कृति, संस्कार और मानवीय मूल्यों को न भूलें। युवाओं को यह समझना होगा कि जीवन की असली सफलता केवल धन, पद और प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि अच्छे चरित्र, मजबूत रिश्तों और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता में है।

याद रखिए, समाज की मजबूती इमारतों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि परिवारों की एकता और इंसानों के बीच प्रेम से तय होती है। यदि आज हमने रिश्तों को बचाने और मानवीय मूल्यों को अपनाने का प्रयास नहीं किया, तो कल हमारे पास सुविधाएं तो होंगी, लेकिन उन्हें साझा करने वाले अपने लोग शायद नहीं होंगे।