नेशनल डेस्क, मुस्कान कुमारी।
साधारण शुरुआत से सिनेमा के बड़े नाम तक का सफर, ‘क्रांतिवीर’ से ‘वेलकम’ तक हर अंदाज में छोड़ी अपनी छाप
मुंबई। नाना पाटेकर का नाम हिंदी सिनेमा में सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर नहीं लिया जाता। उनकी पहचान उस कलाकार की रही, जिसने पर्दे पर किरदार को निभाने के बजाय उसे अपनी आवाज, हावभाव और संवाद अदायगी से जीवंत कर दिया। गंभीर भूमिकाओं से लेकर कॉमेडी तक उनका अंदाज हमेशा अलग रहा।
उनका फिल्मी सफर आसान शुरुआत से नहीं निकला था। आर्थिक मुश्किलों के बीच पढ़ाई पूरी करने वाले विश्वनाथ पाटेकर ने कला की दुनिया से अपना सफर शुरू किया और आगे चलकर सिनेमा के सबसे चर्चित अभिनेताओं में जगह बनाई।
पोस्टर बनाने से अभिनय तक का सफर
नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उनका पूरा नाम विश्वनाथ पाटेकर था। शुरुआती जीवन में परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। पढ़ाई के दौरान उन्होंने अपने खर्च में मदद के लिए काम किया।
कला में उनकी रुचि शुरू से थी। उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ एप्लाइड आर्ट्स में पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान उन्होंने विज्ञापन के लिए पोस्टर बनाने का काम भी किया।
यही कला आगे चलकर उनके अभिनय के काम आई। चेहरे के भाव, शरीर की भाषा और किरदार को समझने की उनकी क्षमता ने उन्हें थिएटर और फिर फिल्मों की ओर पहुंचाया।
1978 में फिल्म ‘गमन’ से उनके फिल्मी करियर की शुरुआत हुई। शुरुआती फिल्मों में उन्हें ऐसे किरदार मिले, जिनमें उनकी प्रतिभा धीरे-धीरे सामने आई।
‘परिंदा’ और ‘क्रांतिवीर’ ने बदल दी पहचान
नाना पाटेकर के करियर में ‘परिंदा’ एक अहम पड़ाव माना जाता है। इसके बाद ‘अंगार’ और ‘क्रांतिवीर’ जैसी फिल्मों ने उन्हें एक मजबूत अभिनेता के रूप में स्थापित किया।
1994 में आई ‘क्रांतिवीर’ में उनका किरदार दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। फिल्म में उनका संवाद बोलने का अंदाज और आक्रामक अभिनय लंबे समय तक याद किया गया।
उनकी खासियत यह थी कि वह किरदार को केवल संवादों के जरिए नहीं निभाते थे। उनकी आंखों के भाव, आवाज का उतार-चढ़ाव और बोलने का तरीका भी कहानी का हिस्सा बन जाता था।
इसी वजह से उनके कई संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
गंभीर भूमिकाओं से कॉमेडी तक
नाना पाटेकर को अक्सर गंभीर और मजबूत किरदारों के लिए याद किया जाता है। लेकिन उनका अभिनय सिर्फ इसी दायरे तक सीमित नहीं रहा।
‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। हर फिल्म में उनका अंदाज बदला, लेकिन पर्दे पर उनकी पकड़ बनी रही।
फिर 2007 में आई ‘वेलकम’ ने उनके करियर का एक अलग पक्ष दर्शकों के सामने रखा। फिल्म में उदय शेट्टी का किरदार उन्होंने ऐसे अंदाज में निभाया कि गंभीर भूमिकाओं के लिए पहचाने जाने वाला अभिनेता कॉमेडी में भी दर्शकों का पसंदीदा बन गया।
उदय शेट्टी के किरदार में उनका गुस्सा, कॉमिक टाइमिंग और संवाद बोलने का अंदाज फिल्म की खासियतों में शामिल रहा।
राष्ट्रीय पुरस्कारों से पद्मश्री तक
नाना पाटेकर के अभिनय को कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। यह उनके लंबे और विविध फिल्मी करियर की बड़ी उपलब्धियों में शामिल है।
साल 2013 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। अभिनय के अलावा उन्होंने निर्देशन में भी हाथ आजमाया। ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन उनके करियर के अलग पहलू को दिखाता है।
मराठी सिनेमा और रंगमंच से भी उनका जुड़ाव रहा। ‘नटसम्राट’ में उनका अभिनय विशेष रूप से चर्चा में रहा। इस फिल्म में उन्होंने उम्र, रिश्तों और अकेलेपन से जूझते एक बुजुर्ग रंगकर्मी की भूमिका निभाई।
पर्दे के बाहर किसानों के लिए काम
नाना पाटेकर की पहचान केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सामाजिक कामों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की शुरुआत की। यह संस्था महाराष्ट्र में सूखे से प्रभावित किसानों और ग्रामीण परिवारों की मदद के लिए काम करती रही है।
किसानों की आर्थिक परेशानी और पानी की समस्या जैसे मुद्दों पर संस्था की ओर से सहायता पहुंचाने की कोशिश की गई। ग्रामीण इलाकों में जल संरक्षण से जुड़े काम भी किए गए।
यानी जिस अभिनेता को पर्दे पर गुस्से और दमदार संवादों के लिए जाना गया, उसके काम का एक दूसरा पक्ष सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ा रहा।
नाना पाटेकर की अभिनय शैली क्यों अलग रही?
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी खासियत उनका सहज लेकिन असरदार अभिनय रहा। उन्होंने अपने किरदारों को जरूरत से ज्यादा सजाने के बजाय उन्हें आम जिंदगी के करीब रखने की कोशिश की।
उनकी आवाज में भारीपन था, लेकिन उनकी असली ताकत संवाद के साथ भाव बदलने में थी। यही कारण है कि उनके निभाए कई किरदार फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के साथ बने रहे।
वह मुख्यधारा की फिल्मों में भी नजर आए और गंभीर सिनेमा में भी। यही विविधता उनके करियर की सबसे खास बातों में रही।






