हेल्थ डेस्क, आर्या कुमारी।
नई दिल्ली: विश्वभर में तेजी से बढ़ रहे पार्किंसंस रोग के मामलों के बीच विशेषज्ञों ने इसकी समय पर और सटीक पहचान के साथ जन-जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनका कहना है कि शुरुआती चरण में सही निदान होने से मरीजों को बेहतर और प्रभावी उपचार मिल सकता है, जिससे उनकी जीवन गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
पार्किंसंस एक प्रगतिशील तंत्रिका तंत्र से जुड़ा विकार है, जो समय के साथ धीरे-धीरे गंभीर होता जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, यह बीमारी विश्व स्तर पर एक करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित कर रही है और बदलती जीवनशैली के कारण यह सबसे तेजी से बढ़ने वाले न्यूरोलॉजिकल विकारों में शामिल हो चुकी है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में मामलों की सही पहचान नहीं हो पाती, जिसके चलते उपचार में देरी होती है।
भारत में भी इस रोग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। पहले इसे मुख्य रूप से बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। अनुमान है कि देश में लगभग 5.76 लाख लोग इससे प्रभावित हैं, जो वैश्विक मरीजों का करीब 10 प्रतिशत है। इसके साथ ही पुरुषों में इसकी दर महिलाओं की तुलना में अधिक देखी गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तनावपूर्ण जीवनशैली, प्रदूषण और कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। मुंबई के पारसी समुदाय में इस बीमारी की दर विश्व में सबसे अधिक दर्ज की गई है। साथ ही भारत में यह रोग अन्य देशों की तुलना में कम उम्र में भी सामने आ सकता है, जबकि आनुवंशिक कारण अपेक्षाकृत कम पाए गए हैं।
इस रोग के प्रमुख लक्षणों में हाथ-पैरों में कंपन, मांसपेशियों में जकड़न, चलने-फिरने में धीमापन, संतुलन में कमी और गिरने का खतरा शामिल हैं। इसके अलावा अवसाद, चिंता, नींद से जुड़ी समस्याएं, सूंघने की क्षमता में कमी और कब्ज जैसे गैर-शारीरिक लक्षण भी देखने को मिलते हैं, जो कई बार शारीरिक लक्षणों से पहले ही प्रकट हो जाते हैं।
एम्स के न्यूरोसर्जरी विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, यह रोग मस्तिष्क में डोपामाइन बनाने वाली कोशिकाओं के धीरे-धीरे नष्ट होने के कारण होता है। शुरुआती चरण में दवाओं के जरिए इसका प्रभावी प्रबंधन संभव है, लेकिन समय के साथ कुछ मरीजों में दवाओं का असर कम होने लगता है। ऐसे मामलों में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (डीबीएस) जैसी उन्नत तकनीकें अधिक स्थिर और बेहतर परिणाम प्रदान कर सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बहु-विषयक दृष्टिकोण, समय पर जांच और आधुनिक उपचार तकनीकों के उपयोग से मरीजों को लंबे समय तक आत्मनिर्भर बनाए रखा जा सकता है। बढ़ती उम्र की आबादी के साथ इस बीमारी के मामलों में और वृद्धि की आशंका है, इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश, अनुसंधान और जागरूकता को बढ़ाना बेहद जरूरी हो गया है।







