लोकल डेस्क, मुस्कान कुमारी।
समय पर नहीं हो पा रही खेतों की जुताई, दिसंबर-जनवरी में झुलसा रोग का खतरा बढ़ने की चिंता
रक्सौल। सीमावर्ती इलाकों में लगातार रुक-रुककर हो रही बारिश ने आलू की खेती की तैयारी प्रभावित कर दी है। खेतों में पानी जमा होने से जुताई करीब 10 दिन तक टल सकती है, जिससे किसानों को समय पर आलू बोने में परेशानी हो रही है।
पूर्वी चंपारण के रक्सौल अनुमंडल क्षेत्र के हरपुर, चिकनी, माघी बरवा, कटकेनवा भवानीपुर, रघौता और रघुनाथपुर समेत कई गांवों में किसान धान के बाद बड़े पैमाने पर सब्जियों की खेती करते हैं। इनमें आलू प्रमुख फसल है। इस समय धान की कटाई के बाद किसान खेत तैयार कर आलू की बुवाई की तैयारी में जुटने वाले थे।
लेकिन बारिश ने उनकी योजना बिगाड़ दी है। बुधवार को हुई बारिश के बाद कई खेतों में पानी जमा हो गया। मिट्टी में नमी ज्यादा होने के कारण खेतों की जुताई करना मुश्किल हो गया है। किसानों का कहना है कि खेत सूखने और जुताई के लायक होने में कई दिन लग सकते हैं।
धान के बाद आलू की तैयारी पर असर
भारत-नेपाल सीमा से लगे इलाकों में ज्यादातर किसान अगहनी धान की खेती करते हैं। वहीं सब्जी उगाने वाले कई किसान कम समय में तैयार होने वाली धान की अगेती किस्म लगाते हैं। इसका मकसद धान की कटाई जल्दी पूरी कर अगली फसल के लिए खेत तैयार करना होता है।
इस बार धान की कटाई का काम पूरा होने के बाद किसान जुताई शुरू करने की तैयारी में थे। इसी दौरान बारिश हो गई। खेतों में पानी भरने से ट्रैक्टर या अन्य कृषि मशीनों से जुताई करना मुश्किल है।
किसानों के लिए यह देरी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आलू की अगेती बुवाई का एक तय समय होता है। अगर खेत समय पर तैयार नहीं हुए तो बुवाई आगे खिसक सकती है। इसका असर फसल के उत्पादन और लागत दोनों पर पड़ने की आशंका रहती है।
किसान शिवलाल ठाकुर, रामबाबू ठाकुर, नवल यादव और रुपेश कुमार समेत अन्य किसानों ने बताया कि धान की कटाई के बाद खेतों की जुताई शुरू करने की तैयारी थी। बारिश के कारण अब खेतों में अधिक नमी है। ऐसे में जुताई के लिए मौसम साफ होने का इंतजार करना पड़ेगा।
दिसंबर-जनवरी में झुलसा रोग की चिंता
आलू की खेती करने वाले किसानों की दूसरी बड़ी चिंता मौसम से जुड़ी है। सीमावर्ती क्षेत्रों में दिसंबर और जनवरी के दौरान ठंड बढ़ने पर आलू की फसल में झुलसा रोग का खतरा बढ़ सकता है।
अगर बुवाई में देरी होती है तो फसल का पूरा चक्र प्रभावित हो सकता है। किसानों को डर है कि मौसम की मार और रोग के कारण उत्पादन उनकी लागत के मुकाबले कम रह सकता है।
आलू की खेती में बीज, जुताई, खाद, सिंचाई और दवा पर खर्च होता है। ऐसे में फसल कमजोर होने या उत्पादन घटने पर किसानों के लिए नुकसान बढ़ सकता है। यही वजह है कि इस समय खेतों के सूखने और मौसम साफ होने का इंतजार किसानों के लिए अहम बन गया है।
बारिश का असर केवल आलू की तैयारी तक सीमित नहीं है। तेज हवा के साथ हुई बारिश से खेतों में तैयार अगहनी धान की फसल को भी नुकसान की आशंका जताई जा रही है। किसानों को चिंता है कि अगर मौसम का रुख इसी तरह बना रहा तो खरीफ फसल के बाद शुरू होने वाली सब्जी की खेती भी प्रभावित हो सकती है।
कृषि विशेषज्ञ ने दी मध्यम प्रजाति की सलाह
कृषि तकनीकी प्रबंधक दिनेश दूबे के अनुसार, आलू की अगेती बुवाई के लिए 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक का समय बेहतर माना जाता है। ऐसे में लगातार खराब मौसम किसानों के लिए चुनौती बन सकता है।
उन्होंने किसानों को मौसम की स्थिति को ध्यान में रखते हुए मध्यम अवधि वाली आलू की प्रजातियों की बुवाई करने की सलाह दी है। उनका कहना है कि मौसम खराब रहने की स्थिति में ऐसी प्रजातियों का चुनाव किसानों के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है।
किसानों के लिए फिलहाल सबसे जरूरी काम खेतों से अतिरिक्त पानी निकलने देना और मिट्टी के पर्याप्त सूखने का इंतजार करना है। बहुत अधिक नमी वाली मिट्टी में जुताई करने से खेत की संरचना भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए मौसम साफ होने के बाद ही खेत तैयार करना बेहतर माना जा रहा है।
समय पर मौसम साफ होना जरूरी
रक्सौल और आसपास के गांवों में सब्जी की खेती किसानों की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धान की कटाई के बाद आलू और दूसरी सब्जियों की खेती शुरू होती है। इसलिए इस समय बारिश का लंबा दौर किसानों की पूरी फसल योजना को प्रभावित कर सकता है।
किसानों की नजर अब मौसम के अगले रुख पर है। अगर जल्द मौसम साफ होता है तो खेतों की जुताई शुरू की जा सकती है और आलू की बुवाई में हुई देरी को कुछ हद तक संभाला जा सकता है। लेकिन बारिश जारी रहने पर खेत तैयार करने और बुवाई का समय और आगे बढ़ सकता है।







