विदेश डेस्क, मुस्कान कुमारी।
मालदीव की राजधानी माले में 23 मार्च को अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर की राष्ट्रपति मोहम्मद मुज्जू से तय मुलाकात आखिरी मिनट में रद्द कर दी गई। मालदीव पक्ष ने बैठक को अंतिम समय में निरस्त किया, जबकि गोर ने उसी दिन विदेश और रक्षा मंत्रियों से मुलाकात की और ट्वीट भी किया।
राष्ट्रपति मुज्जू के कार्यालय से संपर्क करने पर मालदीव पक्ष ने निजी बंद कमरे में मुलाकात का प्रस्ताव रखा, जिसे अमेरिकी राजदूत ने ठुकरा दिया। गोर माले से दिल्ली लौट आए। 39 वर्षीय गोर ट्रंप के करीबी माने जाते हैं और मध्य व दक्षिण एशिया मामलों के लिए अमेरिकी दूत हैं।
राजनीतिक संकट गहराया
मुज्जू की ‘इंडिया आउट’ नीति पर सवार होकर सत्ता में आए राष्ट्रपति इन दिनों घरेलू मोर्चे पर भारी दबाव में हैं। 4 अप्रैल को हुए स्थानीय चुनावों में उनकी पीपुल्स नेशनल कांग्रेस पार्टी को करारी हार मिली। पार्टी इतिहास में पहली बार नगरपालिका चुनाव हारी। साथ ही समवर्ती राष्ट्रपति व संसदीय चुनावों के संवैधानिक संदर्भ पर जनमत संग्रह में 60 प्रतिशत मतदाताओं ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
विपक्षी मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी ने सभी पांच शहरों के मेयर पद पर जीत हासिल की। सूत्रों के मुताबिक मुज्जू पिछले कुछ महीनों से किसी भी विदेशी मेहमान से मुलाकात टाल रहे हैं ताकि मालदीव की आंतरिक राजनीति और विकास योजनाओं पर दबाव न पड़े।
ईरान-इजराइल मुद्दे पर रुख साफ
एक अन्य चर्चा के अनुसार मुज्जू ने गोर से दूरी इसलिए बनाई क्योंकि वे अमेरिका-इजराइल के ईरान के खिलाफ युद्ध के विरोधी हैं। वे नेतन्याहू सरकार और इजराइल की नीतियों के प्रति कट्टर विरोधी माने जाते हैं। हालांकि माले में यह भी कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति किसी भी दबाव से बचने के लिए मुलाकातों से परहेज कर रहे हैं।
वित्तीय संकट और भारत से गुहार
मालदीव की आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब है। मुज्जू सरकार ने 100 मिलियन डॉलर के यूरोबॉन्ड और 400 मिलियन डॉलर के इस्लामिक सुकुक बॉन्ड का भुगतान किया है। अब नई दिल्ली से 400 मिलियन डॉलर के ऋण को दो-तीन साल के लिए रोलओवर करने की अपील की गई है।
भारत सरकार ने अभी तक इस पर फैसला नहीं लिया है। केंद्र ने पहले दो बार छह-छह महीने का रोलओवर मंजूर किया था, लेकिन अब अंतिम फैसला लंबित है।
चीन को बंदरगाह सौंपा, भारत का प्रोजेक्ट प्रभावित
इस बीच मुज्जू ने थिलाफुशी बंदरगाह परियोजना का पहला चरण चीन हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी को 5 फरवरी को सौंप दिया। यह फैसला उस समझौते के विपरीत है जिसमें परियोजना भारत को देने की बात हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट (जो भारत को दिया गया) माले को ठीक थिलाफुशी बंदरगाह से जोड़ने वाला है।
मालदीव में फिलहाल राजनीतिक अस्थिरता, चुनावी झटके और आर्थिक दबाव के बीच यह घटना दोनों देशों के रिश्तों की नई दिशा का संकेत दे रही है।







