लोकल डेस्क, ऋषि राज।
रक्सौल: मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है और साथ ही जीवन का सबसे बड़ा भय भी,जिसको यथार्थ में स्वीकार करना सहज नहीं होता।उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
तात्विक रूप में यह वस्त्र बदलने जैसी प्रक्रिया है,जिसमें जीवात्मा जीवन की काल अवधि पूर्ण होने पर चाहते, न चाहते हुए देहरुपी चोले को उतारकर अपनी अगली यात्रा पर निकल पड़ती है।यह अस्तित्व की महायात्रा का शाश्वत सत्य है , ईश्वर की परिवर्तनशील सृष्टि का अटल विधान है।जन्म और मृत्यु के बीच के काल को जीवन यात्रा के मार्ग में विश्रामगृह के रूप में समझा जा सकता है, जिसमें यात्री रात भर ठहरता है, विश्राम करता है तथा फिर अगले पड़ाव की पारलौकिक यात्रा पर निकल पड़ता है।समझदार यात्री यहाँ के विश्रामकाल में सराय व इसमें रुके बाशिंदों व वस्तुओं से अनावश्यक मोह-ममता नहीं पालते तथा ऐसा कोई कार्य नहीं करते कि विश्रामगृह में ही उलझ कर रह जाएँ।यात्री को यह एहसास रहता है कि यह उसका अस्थायी निवास है व अपने निवास का उद्देश्य पूरा होने पर अगली मंजिल की ओर बढ़ चलना है।
यही इस जीवनरूपी यात्रा का भी सच है, जिसमें समझदार यात्री यहाँ की जीवनरूपी सराय में अनावश्यक मोह-ममता को नहीं पालते,राग-द्वेष आदि में नहीं उलझते ,बल्कि जीवन में आए रिश्तों-नातों व संबंधों को कर्तव्य भाव के साथ पूरा करते हुए ,पीछे एक प्रेरक विरासत को छोड़ते हुए अगली यात्रा पर निकल पड़ते हैं। यह भी एक शाश्वत सत्य है कि जीवात्मा का वास्तविक घर तो सूक्ष्मजगत है, जहाँ वह अपने शुभ अशुभ कर्मों के अनुरूप विभिन्न लोकों में वास करती है।इस तरह इस सृष्टि के चक्र ,ईश्वरीय विधान के अंतर्गत संचालित जीवन-मृत्यु, लोक-परलोक,स्वर्ग-नरक,कर्मफल सिद्धांत आदि की स्वचालित प्रक्रिया के अंतर्गत चलता रहा है,जिसको समझते हुए विवेकशील व्यक्ति संसार में विचरण करते हुए भी अपने वास्तविक घर आध्यात्मिक लोक को नहीं भूलता, जहाँ अपने शुभ कर्मों के फलस्वरूप मृत्युपरांत उसे जाना है।







