वीर अब्दुल हमीद केवल नाम नही बल्कि देशभक्ति, साहस और कुर्बानी के प्रतीक हैं : एनाएतुल्लाह नन्हे
लोकल डेस्क, राजीव कु. भारती |
सीवान। टैंक विध्वंसक के रूप में अगर देश पर शहीद होने वाले किसी वीर जवान को याद किया जाता है, तो वह हैं परमवीर चक्र विजेता शहीद वीर अब्दुल हमीद । देश पर अपनी जान का निछावर करने वाले शहीद वीर अब्दुल हमीद का जन्म एक जुलाई 1933 को यूपी के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में हुआ था। जबकि उनकी शहादत 10 सितम्बर 1965 में हुई । जिन्होंने भारत-पाकिस्तान के साथ 1965 मे हुए युद्ध मे पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे ।
जिनके कारनामों से सम्पूर्ण भारत देश और भारतीयों को गर्व है । उन्हें भारत का सर्वोच्च सेना पुरस्कार परमवीर चक्र मरणोपरान्त दिया गया । वीर अब्दुल हमीद 28 दिसम्बर 1954 को भारतीय सेना में मात्र 20 साल की उम्र में ग्रेनेडियर रेजीमेंट में भर्ती हुए, जहाँ उनकी तैनाती रेजीमेंट के 4 ग्रेनेडियर बटालियन में हुई, जहाँ उन्होंने अपनी आखरी साँस तक देश व शरहद की हिफाजत करते हुए अपनी जान को देश पर निछावर कर दिया । मात्र 32 साल की उम्र में शहादत पाने वाले कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार शहीद वीर अब्दुल हमीद ने उस युद्ध मे जबरदस्त बहादुरी दिखाई थी । शहादत से पहले भी उन्हें वीरता के लिए सैन्य सेवा पदक, रक्षा पदक, समर सेवा पदक और मरणोपरान्त सैन्य सेवा का सबसे बड़ा पदक परमवीर चक्र दिया गया । सन 1965 युद्ध के नायक रहें, शहीद वीर अब्दुल हमीद ने अकेले ही पंजाब के ऐतिहासिक और सरहदी जिला तरनतारन के खेमकरण सेक्टर स्थित आसल उत्ताड़ नामक जगह पर भारतीय सेना के साथ मिल कर पाकिस्तान के घमंड को चकनाचूर करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए । सन 1965 के युद्ध मे पूरी भारतीय फौज उनके साथ थी, लेकिन वे अकेले गन्ना (ईंख) के खेत में छुप कर दुश्मन देश को चकमा देते हुए, गन्ने के खेत मे पाइप के जरिए पानी छोड़वाया, जिससे खेत दलदल बन गया, जिसके बाद पाकिस्तानी सेना आगे बढ़ी तो उस कीचड़ में फंस गई । उसके बाद उन्होने अपनी साधारण जीप (गन माउन्टेड) और अपने 106 एमएम की आर.सी.एल. गन से पाकिस्तान को तबाह कर दिया था । शहीद होने से पहले उन्होंने उस समय के अजेय (कभी नही हारने वाले) कहे जाने वाले अमेरिकी निर्मित पाकिस्तान के कुल 8 पैटन टैंकों को अकेले तबाह -व- बर्बाद कर शमसान घाट बना दिया था । 1965 की लड़ाई में अलग-अलग शरहद पर पाकिस्तान के कुल 200 टैंकों को भारत के वीर जवानों ने बर्बाद किया था । जिनमे अकेले खेमकरण सेक्टर के आसल उत्ताड़ में उनकी शहादत के बाद जो फौज आगे बढ़ी तो पाकितान के कुल 97 पैटन टैंक को मटियामेट कर दिया था । यही कारण है कि आज भी उस जगह को पैटन नगर कहा जाता है । परमवीर चक्र विजेता शहीद वीर अब्दुल हमीद पसमांदा मुस्लिम समाज (पिछड़ा समुदाय) के दर्जी (इदरीसी) बिरादरी के एक साधारण परिवार में यूपी के गाजीपुर जिला के धामूपुर गांव में माता सकीना बेगम और पिता मोहम्मद उस्मान के घर पैदा हुए थे । उन्होंने अपनी शिक्षा गाँव के ही स्कूल में पाँचवीं तक कि थी । उन्हें पढ़ाई से ज्यादा लाठी भांजना, कुश्ती करना, गुलेल चलाना और तीरंदाजी व निशानेबाजी करने का शौक था । वे अपने दर्जी पिता के साथ सिलाई के काम मे भी पढ़ाई के दौरान मदद करते थे । हमें अपने प्यारे देश भारत पर अपनी जान को निछावर करने वाले शहीदों को जात-पात, धर्म-पंत और क्षेत्रवाद से ऊपर उठ कर उन्हें नमन करना चाहिए । सभी शहीदों के जन्म दिवस और पुण्यतिथि पर सरकारी व गैर सरकारी सभी स्कूल, कॉलेज और संस्थाओं में श्रद्धांजलि सभा आयोजित कर सेमिनार, सिम्पोजियम, विचार गोष्ठी का आयोजन होना चाहिए । स्कूल की किताबों में देश पर शहीद होने वाले हर वीर सपूत की गाथा को हर बच्चे को विशेष रूप से पढ़ाना चाहिए, ताकि उनके अंदर देशभक्ति की भावना पैदा हो । याद रहे कि उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में सन 1988 में दूरदर्शन पर परमवीर चक्र नाम की धारावाहिक का भी प्रसारण हुआ है । जिसमे हवलदार वीर अब्दुल हमीद की भूमिका प्रसिद्ध आर्ट कलाकार नसीरुद्दीन शाह ने निभाई है, जिसे हर भारतीय को जरूर देखना चाहिए । वहीं भारतीय डाक विभाग ने सन 2000 में उनके जीप पर सवार होकर राइफल से निशाना साधते हुए वीर अब्दुल हमीद का चित्र वाला डाक टिकट भी जारी किया है । मैं सीवान (बिहार) का रहने वाला एनाएतुल्लाह नन्हे उनके 61 वें शहादत दिवस पर भाव-भीनी श्रद्धांजलि (खेराज -ए- अक़ीदत) पेश करते हुए कहता हुँ की वीर अब्दुल हमीद सिर्फ एक नाम नही है, बल्कि देशभक्ति, साहस और कुर्बानी का प्रतीक है, जो नई नस्ल के लिए प्रेरणा का स्रोत है ।







