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शिक्षा का असली उद्देश्य डिग्री नहीं, संवेदनशील इंसान बनाना है

लोकल डेस्क, मुस्कान सिंह।

बुद्धि हमें सफल होने का रास्ता दिखाती है, लेकिन संस्कार, संवेदना और विवेक हमें एक अच्छा इंसान बनना सिखाते हैं। हृदय और मस्तिष्क का संतुलित विकास ही शिक्षा की वास्तविक सार्थकता है।

रक्सौल। शिक्षा मनुष्य के जीवन को दिशा देने वाली सबसे बड़ी शक्ति है। यह केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करने, परीक्षा में अच्छे अंक लाने या बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि मनुष्य के विचार, व्यवहार, चरित्र और व्यक्तित्व को निखारने की प्रक्रिया है। सच्ची शिक्षा वही है, जो मस्तिष्क को ज्ञानवान बनाने के साथ हृदय को संवेदनशील और व्यवहार को मानवीय बनाए।

आज के समय में शिक्षा की परिभाषा काफी हद तक बदलती दिखाई दे रही है। बच्चों की सफलता को उनके अंकों, डिग्रियों, प्रतियोगी परीक्षाओं और नौकरी के आधार पर मापा जाने लगा है। माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर से बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। विद्यालय भी अच्छे परिणाम और शैक्षणिक उपलब्धियों को अपनी सफलता का आधार मानते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या केवल किताबी ज्ञान और बौद्धिक विकास ही शिक्षा की पूर्णता है?

यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक शिक्षित होने के बावजूद दूसरों के दुख को नहीं समझता, बड़ों का सम्मान नहीं करता, जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे नहीं आता और अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के बारे में नहीं सोचता, तो उसकी शिक्षा कहीं न कहीं अधूरी रह जाती है।

मस्तिष्क हमें सही और गलत का ज्ञान देता है, लेकिन हृदय हमें सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है। बुद्धि हमें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करती है, जबकि संवेदना हमें दूसरों के अधिकारों और भावनाओं का सम्मान करना सिखाती है। ज्ञान हमें आगे बढ़ने की क्षमता देता है, लेकिन विनम्रता हमें अपनी सफलता के बावजूद जमीन से जुड़े रहना सिखाती है।

बच्चों को केवल यह सिखाना पर्याप्त नहीं है कि जीवन में कैसे सफल होना है, बल्कि यह भी सिखाना जरूरी है कि सफलता प्राप्त करने के बाद अपने परिवार, समाज और देश के प्रति उनकी क्या जिम्मेदारी है। उन्हें यह समझाना होगा कि किसी की कमजोरी का मजाक उड़ाना नहीं, बल्कि उसकी मदद करना ही सच्ची इंसानियत है। किसी को हराकर आगे बढ़ना बड़ी उपलब्धि नहीं, बल्कि दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ना जीवन की वास्तविक सफलता है।

शिक्षा का पहला विद्यालय परिवार होता है। बच्चे जो अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को करते हुए देखते हैं, वही उनके व्यवहार और संस्कारों में उतरता है। यदि घर में बड़ों का सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, जरूरतमंदों के प्रति सहयोग और आपसी प्रेम का वातावरण होगा, तो बच्चे भी इन्हीं मूल्यों को अपनाएंगे। केवल उपदेश देने से संस्कार नहीं आते, बल्कि बड़ों के आचरण और व्यवहार से उनका निर्माण होता है।

विद्यालय शिक्षा का दूसरा महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ अनुशासन, सहयोग, ईमानदारी, सहनशीलता, सामाजिक सद्भाव और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाया जाना चाहिए। शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानना और उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनाना भी है।

आज समाज में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, असहिष्णुता, स्वार्थ, अहंकार और आपसी दूरियां हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था में मानवीय मूल्यों को पर्याप्त महत्व तो नहीं दिया जा रहा है? तकनीकी ज्ञान और आधुनिक सुविधाओं ने जीवन को आसान जरूर बनाया है, लेकिन मनुष्य के बीच भावनात्मक दूरी भी बढ़ाई है। ऐसे समय में प्रेम, करुणा, धैर्य, सहानुभूति और आपसी विश्वास की शिक्षा पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।

हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है, जो बच्चों को केवल डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या सफल व्यवसायी ही न बनाए, बल्कि उन्हें अच्छा बेटा-बेटी, जिम्मेदार अभिभावक, संवेदनशील नागरिक और सच्चा इंसान भी बनाए। जो शिक्षा उन्हें ऊंचाइयों तक पहुंचने का हौसला दे, लेकिन दूसरों को छोटा समझने का अहंकार न दे। जो उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी दे, लेकिन दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी सिखाए।

जीवन में ज्ञान का महत्व तभी है, जब उसका उपयोग समाज और मानवता के कल्याण के लिए किया जाए। जिस प्रकार एक पेड़ अपनी छाया और फल दूसरों को देकर सार्थक होता है, उसी प्रकार शिक्षित व्यक्ति भी अपने ज्ञान, अनुभव और अच्छे कर्मों से समाज को लाभ पहुंचाकर अपनी शिक्षा को सार्थक बनाता है।

हमें यह समझना होगा कि शिक्षा का वास्तविक मूल्य केवल प्रमाणपत्रों में नहीं, बल्कि इंसान के चरित्र, व्यवहार, सोच और कर्मों में दिखाई देता है। किसी की पीड़ा को समझना, गलती होने पर उसे स्वीकार करना, जरूरत पड़ने पर क्षमा मांगना, दूसरों की सफलता से प्रसन्न होना और बिना किसी स्वार्थ के किसी के काम आना भी जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षाएं हैं।

अंततः शिक्षा का उद्देश्य केवल बुद्धिमान व्यक्ति तैयार करना नहीं, बल्कि विवेकवान, संस्कारी, संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान का निर्माण करना होना चाहिए। मस्तिष्क की शिक्षा हमें ज्ञान देती है और हृदय की शिक्षा हमें इंसानियत का बोध कराती है। जब इन दोनों का सुंदर समन्वय होता है, तभी व्यक्ति का वास्तविक विकास संभव होता है।

क्योंकि डिग्री इंसान को शिक्षित होने का प्रमाण दे सकती है, लेकिन उसका चरित्र, व्यवहार और दूसरों के प्रति संवेदना ही उसकी शिक्षा की वास्तविक पहचान बनते हैं।

उक्त विश्लेषण लायंस क्लब इंटरनेशनल, डिस्ट्रिक्ट 322ई,जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।